दशहरे पर परमार्थ निकेतन में वेद, उपनिषद, पुराण एवं शास्त्रों का पूजन*

*🌸परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने गुरुकुलों में शास्त्र पूजन की परंपरा को जीवंत रखने का किया आह्वान*

ऋषिकेश, 20 अक्टूबर। विजयादशमी के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने वेद, उपनिषद, पुराण एवं शास्त्रों का श्रद्धापूर्वक पूजन किया। यह पूजन भारतीय ज्ञान-परंपरा, ऋषि-मनीषा और जीवन को दिशा देने वाले शाश्वत मूल्यों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। दशहरा जहाँ अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर मर्यादा की विजय का पर्व है, वहीं शास्त्र पूजन हमें स्मरण कराता है कि विजय का वास्तविक आधार केवल बाहरी सामर्थ्य नहीं, बल्कि आंतरिक विवेक और आत्मसंयम है।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने इस अवसर पर संदेश दिया कि गुरुकुलों में शास्त्र एवं शस्त्र पूजन की परंपरा को केवल एक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि जीवन निर्माण की सतत प्रक्रिया के रूप में जीवंत रखना होगा। आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, अपनी ज्ञान-परंपरा और अपने सांस्कृतिक उत्तरदायित्व से जोड़ना समय की महती आवश्यकता है।

भारतीय परंपरा में शास्त्र केवल पढ़ने का नहीं बल्कि जीवन को समझने, अपने कर्तव्यों को पहचानने और सही-गलत के बीच विवेकपूर्ण निर्णय लेने का मार्ग हैं। वेद मानवता को व्यापक दृष्टि देते हैं, उपनिषद आत्मबोध और चेतना की गहराई तक ले जाते हैं, पुराण आदर्शों को कथाओं के माध्यम से जनमानस तक पहुँचाते हैं और धर्मशास्त्र जीवन के विविध आयामों में कर्तव्य, मर्यादा एवं उत्तरदायित्व का बोध कराते हैं।

शास्त्र पूजन का अर्थ पुस्तकों के सम्मुख दीप प्रज्वलित करना भर नहीं है; इसका वास्तविक अर्थ है ज्ञान के प्रति विनम्र होना, सत्य को स्वीकार करने का साहस रखना और अपने आचरण को सद्ज्ञान के अनुरूप ढालना। ग्रंथों की पूजा तभी सार्थक होती है, जब उनके आदर्श हमारे व्यवहार में उतरें, हमारे निर्णयों में विवेक बनें और हमारे जीवन में करुणा, न्याय तथा सेवा का आधार बनें।

आज सूचनाओं का विस्तार अभूतपूर्व है, लेकिन सूचना और ज्ञान एक ही बात नहीं हैं। तकनीक हमें बहुत कुछ बता सकती है, किंतु क्या उचित है, क्या अनुचित; किसका हित करना है, किस प्रलोभन से बचना है और शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य से करना है, इन प्रश्नों का उत्तर विवेक देता है। शास्त्र पूजन इसी विवेक को जागृत करने का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अवसर है।

गुरुकुल भारतीय शिक्षा-दर्शन की वह परंपरा है, जहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास रहा है। यहाँ ज्ञान के साथ विनय, सामर्थ्य के साथ संयम, अधिकार के साथ कर्तव्य और सफलता के साथ सेवा का संस्कार विकसित करने की प्रेरणा मिलती है।

दशहरे पर गुरुकुलों में शास्त्र पूजन का विशेष महत्त्व है, क्योंकि यह विद्यार्थियों को स्मरण कराता है कि शिक्षा का सर्वाेच्च उद्देश्य केवल अधिक जानना नहीं, बल्कि सही दृष्टि से जीना है। यदि ज्ञान से अहंकार बढ़े, सामर्थ्य से संवेदनशीलता घटे और सफलता से समाज के प्रति उत्तरदायित्व समाप्त हो जाए, तो शिक्षा अपनी पूर्णता प्राप्त नहीं करती।

गुरुकुलों में इस परंपरा को जीवंत रखने का अर्थ है कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल इतिहास की वस्तु न समझे, बल्कि वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की दिशा के रूप में स्वीकार करे। परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह अगली पीढ़ी के विचार, व्यवहार और चरित्र में स्थान पाती है।

परमार्थ निकेतन में शास्त्र पूजन की यह परंपरा इसी व्यापक संदेश को रेखांकित करती है कि आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को अधिक जागरूक, उत्तरदायी और लोकमंगलकारी बनाने की प्रेरणा है। शास्त्र हमें दृष्टि दें, शस्त्र रक्षा का संकल्प दें और श्रीराम के आदर्श हमारे आचरण को दिशा दें, तभी विजयादशमी का पर्व अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होगा।

गुरुकुलों में शास्त्र और शस्त्र पूजन की परंपरा इसी संकल्प के साथ आगे बढ़े कि ज्ञान से विवेक, शक्ति से सुरक्षा, शिक्षा से संस्कार और धर्म से मानवता पुष्ट हो। यही विजयादशमी का शाश्वत संदेश है, शक्ति का आधार धर्म, ज्ञान का आधार विनय और विजय का आधार मर्यादा है।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma – Senior Woman Journalist Shashi Sharma has been active in journalism since 1985, holding the distinction of being Uttarakhand's first female journalist. For 36 years, starting in 1989, she rendered distinguished service to India's premier news agency, PTI. During this long tenure, she demonstrated the power of her writing on numerous significant occasions; notably, she spent two months in Tehri reporting positively on the Tehri Dam—which was then mired in controversy—and used her pen to help pave the way for its construction. Currently, Mrs. Shashi Sharma runs the news portal *Newsok24.com* and serves as the editor of the weekly newspaper *Desh Nirdesh*; she is also a registered anchor and commentator for Delhi Doordarshan. शशि शर्मा वरिष्ठ महिला पत्रकार शशि शर्मा उत्तराखंड की पहली महिला पत्रकार के तौर पर 1985 से पत्रकारिता में कार्यरत हैं। 1989 से 36 वर्षों तक उन्होंने भारत की शीर्ष समाचार एजेंसी पीटीआई के लिए अपनी सशक्त सेवाएं दीं। छत्तीस वर्षों की लंबी अवधि तक पीटीआई के लिए काम करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर अपनी कलम का लोहा मनवाया, जिसमें दो महीने तक टिहरी में रहकर विवादों के संकट में रहे टिहरी बांध पर सकारात्मक रिपोर्टिंग कर अपनी कलम की ताकत से निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में श्रीमती शशि शर्मा Newsok24 com न्यूज पोर्टल को चला रहीं हैं और साप्ताहिक समाचार पत्र देश निर्देश की सम्पादक होने के साथ ही दिल्ली दूरदर्शन की रजिस्टर्ड एंकर और कमेंटेटर भी हैं।

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