*आईआईटी रुड़की की रूटैज स्मार्ट विलेज सेंटर (आरएसवीसी) पहल से आजीविका, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के विजन 2047 को मिलेगी गति*

– शहतूत की खेती रेशम उत्पादन और मूल्य-वर्धित उत्पादों के माध्यम से नई आजीविका संभावनाएँ खोलेगी

– आरएसवीसी में स्थापित उन्नत बागेश्वरी ऊन चरखा अब पैरों से चलने वाले और विद्युत दोनों मोड में उपयोग किया जा सकता है

– आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो के. के. पंत ने कहा- शिक्षा और प्रौद्योगिकी मिलकर ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में प्रगति की सबसे मज़बूत नींव बना रहे

– “हरित खुलगाड़ नारी शक्ति उत्सव 2026” का आयोजन आईआईटी रुड़की ने 17 जनवरी 2026 को अल्मोड़ा के खुंट गाँव में किया

अल्मोड़ा के खुंट गाँव में आईआईटी रुड़की द्वारा ज़मीनी स्तर पर शिक्षा, आजीविका, महिला सशक्तिकरण और नवाचारों को आगे बढ़ाया जा रहा है। जिसमें रूटैज स्मार्ट विलेज सेंटर (आरएसवीसी) के अंतर्गत काम किया जा रहा है। जिसकी परिकल्पना भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (पीएसए) के कार्यालय द्वारा की गई है।

आईआईटी रुड़की, सेतु आयोग, नेहिर हिमालयन फ़ाउंडेशन और आरटी फ़ाउंडेशन के सहयोगात्मक कार्यान्वयन प्रयास, रेशम विभाग के सहयोग तथा ग्रामीणों की भागीदारी के साथ, यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि पहलें केवल योजना तक सीमित न रहें बल्कि रोज़मर्रा के ग्राम जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई दें। आरएसवीसी के अंतर्गत एक प्रमुख उपलब्धि एकीकृत खेती की दिशा में एक लाख से अधिक शहतूत पौधों का रोपण है, जिसका नेतृत्व मुख्यतः क्षेत्र की महिलाओं द्वारा किया गया है। उनकी प्रतिबद्धता ने इसे समुदाय- प्रेरित विकास का एक सशक्त उदाहरण बना दिया है। रोपण और आजीविका गतिविधियों से लेकर सामुदायिक पुस्तकालय और प्रौद्योगिकी-आधारित समाधानों तक, इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गाँव में किया जा रहा कार्य शिक्षा मंत्रालय की व्यापक दृष्टि को भी प्रतिबिंबित करता है, विशेष रूप से सामुदायिक पुस्तकालय और अध्ययन स्थलों जैसे प्रयासों के माध्यम से, जो जमीनी स्तर पर शिक्षा को सुदृढ़ करने में सहायक हो रहे हैं।

यह रोपण पहल अनेक लाभ उत्पन्न कर रही है। शहतूत की खेती रेशम उत्पादन और मूल्य-वर्धित उत्पादों के माध्यम से नई आजीविका संभावनाएँ खोल रही है, साथ ही मृदा अपरदन को कम करने और भूमि की स्थिरता में सुधार करने में भी सहायक है। किसान एकीकृत खेती का अभ्यास कर रहे हैं, शहतूत के साथ हल्दी

और अदरक की खेती कर रहे हैं, तथा शहतूत चाय जैसे उत्पादों की खोज कर रहे हैं, जिससे स्थानीय उद्यम के लिए और अधिक अवसर सृजित हो रहे हैं।

आरएसवीसी में स्थापित उन्नत बागेश्वरी ऊन चरखा, जिसे स्थानीय कारीगरों के लिए कताई को आसान और अधिक उपयोगी बनाने हेतु पुनः डिज़ाइन किया गया है। यह चरखा अब पैरों से चलने वाले और विद्युत — दोनों मोड में उपयोग किया जा सकता है तथा इसमें बैटरी बैक-अप, सौर समर्थन और समायोज्य गति जैसी

विशेषताएँ शामिल हैं। ये सुधार स्थानीय, तिब्बती, तिब्बती-56 और मेरिनो ऊन से बेहतर गुणवत्ता का सूत तैयार करने में सहायक हैं। महिलाओं और हथकरघा कर्मियों ने साझा किया कि नया डिज़ाइन समय बचाता है, श्रम कम करता है और उत्पादकता बढ़ाता है, साथ ही पारंपरिक कौशल और आजीविका को समर्थन देता है।

कृषि से परे, इस यात्रा ने महिलाओं को भागीदारी और नेतृत्व का एक मंच प्रदान किया है। अनेक महिलाएँ जो पहले घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, अब सक्रिय रूप से रोपण, योजना निर्माण और आजीविका गतिविधियों में संलग्न हैं। सभी आयु वर्ग की महिलाओं ने इस रोपण यात्रा में सक्रिय भागीदारी की—छोटी बालिकाओं से लेकर बुज़ुर्ग महिलाओं तक—जिससे यह एक वास्तविक रूप से समावेशी सामुदायिक प्रयास बन गया। उनकी भागीदारी ने आत्मविश्वास का निर्माण किया है, निर्णय-निर्माण की भूमिकाओं को सुदृढ़ किया है और अधिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया है। इस पहल ने गाँव के भीतर महिलाओं को दृश्यता, आवाज़ और अवसर प्रदान करके उनके विकास में स्पष्ट योगदान दिया है।

आईआईटी रुड़की ने “हरित खुलगाड़ नारी शक्ति उत्सव 2026” का आयोजन 17 जनवरी 2026 को अल्मोड़ा के खुंट गाँव में किया, ताकि स्थानीय समुदाय की उपलब्धियों को प्रदर्शित और सम्मानित किया जा सके। इस कार्यक्रम ने ग्रामीणों को अपने सामूहिक प्रयासों पर विचार करने, अपनी प्रगति को स्वीकार करने और सतत विकास के लिए भविष्य के मार्गों पर चर्चा करने के लिए एक साथ लाया।

श्रीमती सरस्वती देवी, ग्राम धमास, आयु 45 वर्ष ने कार्यक्रम के दौरान साझा किया, “पहले हम पूरा दिन घर के अंदर ही रहते थे। अब हम बैठकों में जाते हैं, खेतों में काम करते हैं, नई चीज़ें सीखते हैं और दूसरों के सामने बोलने में आत्मविश्वास महसूस करते हैं। इस काम ने हमें कमाने में मदद की है, लेकिन उससे भी बढ़कर इसने हमें स्वयं पर विश्वास करना और आत्मनिर्भर बनना सिखाया है।” सुश्री ज्योति बिष्ट, ग्राम धमास, आयु 25 वर्ष ने साझा किया, “कृषि गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़कर और नेहिर हिमालयन संस्थान द्वारा संचालित आरएसवीसी से जुड़कर, जिसे आईआईटी रुड़की का मार्गदर्शन और समर्थन प्राप्त है, हमें अपने घरों और समुदायों में सम्मान मिला है। हमें एक ऐसा मंच मिला है जहाँ हमारी आवाज़ सुनी जाती है और हमारी राय मायने रखती है।”

कोमल बिष्ट, ग्राम धमास, आयु 24 वर्ष ने जोड़ा, “आरएसवीसी से जुड़कर हम महिला किसानों को जोड़ने में सक्षम हुए हैं, हमने अपने परिवारों के साथ-साथ आस-पास के परिवारों को भी अपने खेतों में खेती शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया है और इससे सभी के लिए आजीविका के अवसर बने हैं।”

श्री पुरण नेगी, ग्राम श्याहीदेवी, आयु 28 वर्ष ने साझा किया, “शहतूत रोपण के लिए उपकरण प्राप्त होना हमारे लिए एक बड़ा प्रोत्साहन रहा है। आईआईटी रुड़की के तकनीकी सहयोग से हम उत्पादकता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने में सक्षम हुए—प्रत्येक व्यक्ति मैनुअल प्रयास से केवल 20 गड्ढों की तुलना में लगभग

100 गड्ढे तैयार कर सका। इस तकनीकी हस्तक्षेप ने हमारी दक्षता बढ़ाई है और हमें खेती के वास्तविक परिणामों पर अधिक प्रभावी ढंग से ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाया है।”

श्रीमती जीवंटी देवी, ग्राम सल्ला, आयु 75 वर्ष ने साझा किया, “अपने ही गाँव में रहकर अपने खेतों में काम करना ज़रूरी है ताकि हम अपनी आजीविका कमा सकें और पहाड़ों को जीवित रख सकें। यह भी ज़रूरी है कि हम अपने बच्चों को शिक्षा दें ताकि वे भविष्य में इस काम को आगे बढ़ा सकें।”

कुछ महिलाओं ने श्री एस. एल. शाह द्वारा स्थापित और अब उनके परिवार तथा आईआईटी रुड़की के संयुक्त प्रयासों से, नेहिर हिमालयन संस्थान के साथ, समर्थित निःशुल्क सामुदायिक पुस्तकालय के सकारात्मक प्रभाव के बारे में बात की। उन्होंने कहा, “अब हमारे बच्चे बैठकर किताबें पढ़ सकते हैं, पढ़ाई की तैयारी कर सकते हैं और नई चीज़ें सीख सकते हैं। यहाँ तक कि बड़े लोग भी पढ़ने आते हैं। इससे हमारे गाँव का सीखने का वातावरण बदल गया है।”

श्री राज शेखर जोशी, उपाध्यक्ष, सेतु आयोग ने भी सभा को संबोधित किया और पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए निरंतर प्रयासों पर बात की। उन्होंने कहा,“लीड नॉलेज इंस्टीट्यूशन के रूप में आईआईटी रुड़की की भूमिका ने सेतु आयोग की जमीनी पहलों को काफ़ी सुदृढ़ किया है। हम खुंट में ग्रामीण केंद्र पहल से प्राप्त सीख को सेतु आयोग के एकीकृत स्मार्ट विलेज सेंटर में संयुक्त रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। खुंट का केंद्र यह प्रदर्शित करता है कि छोटे खेतों का क्लस्टरिंग और एकीकृत, मिश्रित फसल प्रणाली किस प्रकार पर्वतीय गाँवों में सतत आर्थिक विकास को संभव बना सकती है। महिलाओं, युवाओं और बालिकाओं का सक्रिय

समावेशन—उनकी क्षमताओं और आत्मविश्वास का निर्माण, स्थानीय नेतृत्व को सुदृढ़ करना और सम्मानजनक आजीविका के मार्ग बनाना—इसे एक अत्यंत सशक्त पहल बनाता है। यह पहल राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए सेतु आयोग की दृष्टि के साथ पूरी तरह संरेखित है। हम उत्तराखंड में ऐसे साक्ष्य-आधारित, डेटा-सूचित और जलवायु-लचीले मॉडलों को विस्तारित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने समुदाय के साथ एक सशक्त संदेश साझा किया। उन्होंने कहा, “शिक्षा और प्रौद्योगिकी मिलकर ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में प्रगति की सबसे मज़बूत नींव बनाते हैं। जब वैज्ञानिक ज्ञान को जमीनी स्तर पर व्यावहारिक समाधानों में रूपांतरित किया जाता है, तो यह

समुदायों को स्थानीय आजीविका बनाने, पलायन को कम करने और सतत रूप से आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है। खुंट गाँव की महिलाएँ ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ की भावना का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, यह दिखाते हुए कि लक्षित तकनीकी हस्तक्षेप किस प्रकार एकीकृत खेती को आत्मनिर्भरता, नेतृत्व और पारिस्थितिक

उत्तरदायित्व के एक मॉडल में रूपांतरित कर सकते हैं।”

यह पहल विजन 2047 की भावना को प्रतिबिंबित करती है, जो समावेशी विकास, आत्मनिर्भर समुदायों और सतत विकास पर केंद्रित है। इस प्रयास को अर्थपूर्ण बनाता है यह तथ्य कि लोग केवल लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि सक्रिय भागीदार हैं। परिवर्तन धीरे-धीरे हो सकते हैं, लेकिन वे वास्तविक हैं—आत्मविश्वास का निर्माण,

कौशल को सुदृढ़ करना और गाँव के भीतर वास्तविक अवसरों का सृजन।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma Working in journalism since 1985 as the first woman journalist of Uttarakhand. From 1989 for 36 years, she provided her strong services for India's top news agency PTI. Working for a long period of thirty-six years for PTI, he got her pen ironed on many important occasions, in which, by staying in Tehri for two months, positive reporting on Tehri Dam, which was in crisis of controversies, paved the way for construction with the power of her pen. Delivered.

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