Rishikul Vidyapeeth, पुरोहताई का शिक्षण संस्थान ऋषिकुल विद्यापीठ ब्रह्मचर्य आश्रम किसका ?
Rishikul Vidyapeeth, Whose is Rishikul Vidyapeeth Brahmacharya Ashram, the educational institution of priesthood?
पुरोहित समाज बनाम पुरोहित समाज बनाम व्यवस्था
महामना मदन मोहन मालवीय की ऋषिकुल विद्यापीठ संस्था सरकार ने कहा निजी सम्पत्ति
Rishikul Vidyapeeth, हरिद्वार पुरोहित परंपरा का जीवित केंद्र है जिसमें वैदिक धर्म कर्म से संबंधित शिक्षा ग्रहण करने भारत ही नहीं अन्य हिंदू देशों से भी विद्यार्थी भारत आते है, हिन्दुत्व को विस्तार देने के लिए महामना मदन मोहन मालवीय ने हरिद्वार में ऋषिकुल विद्यापीठ की स्थापना की जो सदियों से धर्म, संस्कार और वैदिक शिक्षा को समाज तक पहुँचा रहा है।

पुरोहित समाज की शिक्षा और बौद्धिक उन्नयन के उद्देश्य से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने ऋषिकुल/विद्यापीठ ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत संस्था की स्थापना वर्ष 1907 में की थी, परंतु आज वही संस्था व्यवस्था और पुरोहित समाज के बीच टकराव का प्रतीक बनती जा रही है।

यह टकराव तब खुलकर सामने आया, जब हरिद्वार के तीर्थ पुरोहित एवं अधिवक्ता गौरव गोविन्द त्रिपाठी ने सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत याचिका दायर कर यह सवाल उठाया कि क्या यह ऐतिहासिक संस्था वास्तव में निजी है, या फिर सरकार द्वारा अधिग्रहित/नियंत्रित होकर भी उसे निजी बताकर सार्वजनिक जवाबदेही से मुक्त रखा जा रहा है।


सूचना आयोग में हुई सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आया
संस्था के पक्ष या विपक्ष में राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व जिलाधिकारी एवं सिटी मजिस्ट्रेट, हरिद्वार के माध्यम से किया गया, जबकि दूसरी ओर विद्यालय/महाविद्यालय ने स्वयं अपना पक्ष रखा। यह स्थिति अपने आप में यह प्रश्न खड़ा करती है कि यदि सरकार का प्रतिनिधि उपस्थित है, तो संस्था पूरी तरह निजी कैसे मानी जा सकती है?
सूचना आयोग ने उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर संस्था को फिलहाल निजी मानते हुए RTI के दायरे से बाहर रखा। लेकिन यह निर्णय व्यवस्था की सुविधा भले हो, पुरोहित समाज के लिए यह एक और निराशा का अध्याय बन गया।
पुरोहित समाज का कहना है कि जब बात भूमि, भवन, परंपरा और शिक्षा की हो, तब व्यवस्था उन्हें ऐतिहासिक धरोहर बताती है, पर जब सवाल जवाबदेही और सूचना का आता है, तब वही संस्थाएं अचानक “निजी” घोषित कर दी जाती हैं। यह दोहरा मापदंड पुरोहित समाज को लगातार हाशिए पर धकेलने का कार्य कर रहा है।
अधिवक्ता गौरव गोविन्द त्रिपाठी का तर्क है कि यह लड़ाई किसी एक सूचना की नहीं, बल्कि उस सिद्धांत की है कि जिस संस्था की स्थापना सार्वजनिक उद्देश्य से हुई हो और जिस पर प्रशासनिक नियंत्रण या प्रतिनिधित्व रहा हो, वह जनता के प्रति उत्तरदायी होनी ही चाहिए यह मामला एक व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करता है
क्या तीर्थ पुरोहित समाज केवल परंपरा निभाने का माध्यम रह जाएगा, उसकी शिक्षा, संस्थाएं और अधिकार व्यवस्था की फाइलों में गुम होते जाएंगे?
सूचना आयोग में प्रकरण का औपचारिक निस्तारण हो चुका है, लेकिन पुरोहित समाज बनाम व्यवस्था की यह बहस अब सड़क, समाज और सार्वजनिक विमर्श तक पहुँचने के संकेत दे रही है।
