परमार्थ निकेतन में मनायी माँ यशोदा जयंती*

श्रद्धा, भक्ति एवं मातृत्व का दिव्य महोत्सव*

मातृभूमि, मातृभाषा और गंगा माँ ये सभी मातृत्व की ही अभिव्यक्तियाँ*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश, 7 फरवरी। आज माँ यशोदा जयंती के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में दिव्य भक्ति, मातृत्व, वात्सल्य और सनातन संस्कृति की गरिमा से ओतप्रोत वातावरण था, आज की परमार्थ गंगा आरती माँ यशोदा जी को समर्पित की। इस विशेष पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने संदेश दिया कि माँ यशोदा के निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और मातृशक्ति के आदर्श स्वरूप का दिव्य प्रतिबिंब है। माँ यशोदा, मातृत्व की जीवंत चेतना हैं। उन्होंने कहा, “माँ का प्रेम शर्तों से परे होता है। वह त्याग, करुणा और समर्पण का सर्वाेच्च स्वरूप है।

पूज्य स्वामी जी ने आगे कहा कि आज के युग में जब परिवारों में दूरी, तनाव और स्वार्थ बढ़ रहा है, तब माँ यशोदा का जीवन हमें पुनः परिवार, संस्कार और प्रेम के मूल्यों की ओर लौटने का संदेश देता है। मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संरक्षण, पोषण और मार्गदर्शन की सतत प्रक्रिया है। यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को केवल पाला ही नहीं, बल्कि उन्हें धर्म, साहस और करुणा के संस्कार भी दिए। यही सनातन संस्कृति की पहचान है।

ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम है। जब हृदय में निष्काम प्रेम होता है, तब वही प्रेम भक्ति बन जाता है। उन्होंने माताओं और युवाओं से आग्रह किया कि वे बच्चों में संस्कार, संवेदनशीलता और सेवा की भावना विकसित करें, ताकि आने वाली पीढ़ी आध्यात्मिक और नैतिक रूप से समृद्ध बन सके।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय संस्कृति में ‘माँ’ का स्थान सर्वाेपरि है मातृभूमि, मातृभाषा और गंगा माँ ये सभी मातृत्व की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। जब हम माँ का सम्मान करते हैं, तभी हम प्रकृति, संस्कृति और राष्ट्र का भी सम्मान करते हैं। माँ यशोदा जयंती हमें याद दिलाती है कि समाज का भविष्य सशक्त तभी होगा जब मातृशक्ति का सम्मान और सशक्तिकरण होगा।

स्वामी जी ने कहा कि आज के समय में जब जीवन की गति अत्यंत तीव्र हो गई है और आधुनिकता की दौड़ में रिश्तों की ऊष्मा कहीं पीछे छूटती जा रही है, ऐसे दौर में मातृत्व, ममता, वात्सल्य और संस्कारों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली प्रथम गुरु होती है। उसके स्नेहिल स्पर्श में सुरक्षा है, उसकी ममता में करुणा है और उसके संस्कारों में भविष्य का निर्माण छिपा है।

मातृत्व वह शक्ति है जो बच्चे को प्रेम, धैर्य, त्याग और सहनशीलता सिखाती है। माँ की गोद ही वह पहला विद्यालय है, जहाँ से मानवता, नैतिकता और संवेदनशीलता के पाठ प्रारम्भ होते हैं। यदि बाल्यावस्था में सही संस्कार मिलें, तो वही बालक आगे चलकर एक जिम्मेदार नागरिक और श्रेष्ठ व्यक्तित्व बनता है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में परिवारों को चाहिए कि वे बच्चों के साथ समय बिताएँ, उन्हें तकनीक से अधिक परंपरा और संस्कृति से जोड़ें क्योंकि संस्कारहीन प्रगति अधूरी है। मातृत्व और वात्सल्य ही वह आधार हैं, जो समाज को प्रेम, शांति और एकता से जोड़ते हैं। वास्तव में, माँ का आशीर्वाद ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma Working in journalism since 1985 as the first woman journalist of Uttarakhand. From 1989 for 36 years, she provided her strong services for India's top news agency PTI. Working for a long period of thirty-six years for PTI, he got her pen ironed on many important occasions, in which, by staying in Tehri for two months, positive reporting on Tehri Dam, which was in crisis of controversies, paved the way for construction with the power of her pen. Delivered.

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