भजन सम्राट पद्मश्री श्री अनूप जलोटा जी का परमार्थ निकेतन में दर्शनार्थ आगमन
विश्व विख्यात परमार्थ गंगा आरती में किया सहभाग
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी से दिव्य भेंटवार्ता
पूज्य स्वामी जी ने रूद्राक्ष का दिव्य पौधा भेंट कर पद्मश्री श्री अनूप जलोटा जी का किया अभिनन्दन
ऋषिकेश। भजन सम्राट पद्मश्री श्री अनूप जलोटा जी का परमार्थ निकेतन में दर्शनार्थ आगमन हुआ। यह उनके लिये एक दिव्य, भावपूर्ण और अविस्मरणीय क्षण था।
श्री अनूप जलोटा जी संगीत के एक ऐसे साधक है जिनकी स्वर-सरिता ने अनगिनत हृदयों को भक्ति से जोड़ा है। उनकी उपस्थिति से ही सम्पूर्ण वातावरण भक्ति, श्रद्धा और प्रेम की मधुर तरंगों से युक्त हो जाता है।
परमार्थ निकेतन की विश्व विख्यात गंगा आरती में उनकी सहभागिता ने इस संध्या को और भी दिव्यता प्रदान की। श्री अनूप जलोटा जी के भजनों की मधुर ध्वनि जब वातावरण में व्याप्त होती है तो हृदय आध्यात्मिक अनुभूतियों से युक्त हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भक्ति रस साकार रूप में प्रवाहित हो रहा हो।
श्री अनूप जलोटा जी ने पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और साध्वी भगवती सरस्वती जी से स्नेहिल दिव्य भेंटवार्ता की। इस संवाद में भक्ति, सेवा, संस्कृति और सनातन मूल्यों की गूंज स्पष्ट थी। इस आत्मीय मुलाकात में वर्षों से जुड़े संबंधों की गहराई और पवित्रता झलक रही थी।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने इस अवसर पर अपने उद्बोधन में अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में कहा कि श्री अनूप जलोटा जी का परमार्थ निकेतन से रिश्ता आज का नहीं, बल्कि उनके पूज्य पिताश्री स्वर्गीय श्री पुरुषोत्तम दास जलोटा जी के समय से है। उन्होंने कहा, “यह संबंध केवल समय की सीमाओं में बंधा नहीं है, बल्कि यह प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की वह गंगा है जो पिछले 50 वर्षों से निरंतर प्रवाहित हो रही है।”
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि “जो रिश्ते बिना स्वार्थ के होते हैं, वे न तो किस्तों में होते हैं, न ही रास्तों में खोते हैं, और न ही कभी टूटते हैं। ऐसे रिश्ते केवल प्रेम के होते हैं, निर्मल, निष्कलंक और अनंत होते है। श्री अनूप जलोटा जी और परमार्थ निकेतन के बीच का यह संबंध भी ऐसा ही एक दिव्य और खूबसूरत रिश्ता है।
इस पावन अवसर पर साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि श्री अनूप जलोटा जी के भजनों ने न केवल भारत में, बल्कि विश्वभर में सनातन संस्कृति की मधुर ध्वनि को पहुंचाया है। उनकी आवाज में वह शक्ति है जो सीधे आत्मा को स्पर्श करती है और साधकों को ईश्वर से जोड़ने का माध्यम बनती है।

श्री अनूप जलोटा जी ने भी अपने हृदय की भावनाओं को साझा करते हुए कहा कि परमार्थ निकेतन उनके लिए केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक घर है। उन्होंने स्मरण किया कि उनके पिताश्री के समय से ही इस धाम से उनका गहरा संबंध रहा है, और यहाँ आकर उन्हें सदैव एक विशेष शांति और आत्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है।
उन्होंने कहा, “गंगा तट पर बैठकर, पूज्य स्वामीजी के पावन सान्निध्य में आरती में सहभागी होकर जो अनुभूति प्राप्त होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। यहाँ हर बार आना ऐसा लगता है जैसे आत्मा को पुनः अपने स्रोत से जोड़ने का अवसर मिल गया हो।”
यह आगमन एक भावनात्मक पुनर्मिलन है, जहाँ वर्षों पुराने संबंधों ने फिर से नई ऊर्जा प्राप्त की। यह वह क्षण है जब भक्ति, संस्कृति और प्रेम एक साथ मिलकर एक अद्वितीय अनुभव का निर्माण कर रहे है। यह एक ऐसी आध्यात्मिक धारा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रहती है।
इस अवसर पर पूज्य स्वामीजी ने रूद्राक्ष का दिव्य पौधा पद्मश्री श्री अनूप जलोटा जी को प्रदान किया।