80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को परमार्थ निकेतन की मंगलकामनाएँ
💥परमार्थ गुरुकुल में राष्ट्रभक्ति, संस्कृति और संकल्प के साथ स्वतंत्रता दिवस का भव्य आयोजन
🇮🇳भारत की स्वतंत्रता की गाथा को समझना हो तो भारत के गुरुकुलों और उसकी ज्ञान-परंपरा को समझना होगा
🌼स्वतंत्रता के 80 वर्ष-संघर्ष, निर्माण और आत्मविश्वास की यात्रा
🙏🏻स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 15 अगस्त। भारत की स्वतंत्रता सहस्रों वर्षों की उस अखंड राष्ट्रीय चेतना की विजयगाथा है, जिसने भारतभूमि को सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” के उदात्त आदर्शों से आलोकित किया है। स्वतंत्रता के 80वें वर्ष के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश की ओर से समस्त राष्ट्रवासियों को स्वतंत्रता दिवस की मंगलकामनाएँ।
परमार्थ गुरुकुल में स्वतंत्रता दिवस का पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास, गौरव और राष्ट्रभक्ति के साथ मनाया। तिरंगे के सम्मान में पूरा गुरुकुल परिसर राष्ट्रप्रेम की भावनाओं से ओत-प्रोत हो उठा। गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने वैदिक मंत्रोच्चार, राष्ट्रगान, देशभक्ति के गीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की गौरवशाली परंपरा, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रनिर्माण के संकल्प को जीवंत किया।
इस अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में राष्ट्रवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि भारत की स्वतंत्रता केवल 15 अगस्त 1947 को प्राप्त हुई राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है; भारत की वास्तविक स्वतंत्रता उसकी आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता, ज्ञान-परंपरा और राष्ट्रधर्म में सदियों से जीवित रही है।
उन्होंने अपने संदेश में कहा कि भारत ने कभी केवल भूभाग को राष्ट्र नहीं माना। हमारे लिए राष्ट्र एक जीवंत चेतना है, मातृभूमि, गंगा, हिमालय, ऋषि-परंपरा, संस्कृति, संस्कार, शास्त्र, साधना और समाज, इन सबकी समन्वित अनुभूति ही भारत है। इसलिए भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल युद्धों और आंदोलनों का इतिहास नहीं, बल्कि यह उस अदम्य आत्मबल की कथा है जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी भारत की आत्मा को जीवित रखा।
भारत की स्वतंत्रता की गाथा को समझना हो तो भारत के गुरुकुलों और उसकी ज्ञान-परंपरा को समझना होगा। गुरुकुल केवल शिक्षा प्राप्त करने के केंद्र नहीं थे; वे ऐसे राष्ट्रनिर्माण के तीर्थ थे जहाँ बालक को केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र, संयम, कर्तव्य, शौर्य, सेवा, सत्य, त्याग और राष्ट्रधर्म की शिक्षा दी जाती थी।

आचार्य और शिष्य के मध्य संबंध, जीवन के निर्माण का संबंध था। गुरुकुलों ने ऐसी पीढ़ियाँ तैयार कीं जिनके लिए व्यक्तिगत सुख से ऊपर धर्म, समाज और राष्ट्र का हित था। यही संस्कार आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना में भी दिखाई दिए।
भारत की स्वतंत्रता की नींव उन अनगिनत संतों, आचार्यों, संन्यासियों, शिक्षकों, क्रांतिकारियों, किसानों, श्रमिकों, माताओं और युवाओं के त्याग से मजबूत हुई जिन्होंने भारत की आत्मा को जागृत रखा। श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग, उपनिषदों का आत्मज्ञान, रामायण का मर्यादा और धर्म, महाभारत का कर्तव्यबोध तथा वेदों का लोककल्याणकारी चिंतन, इन सबने भारतीय समाज को हजारों वर्षों तक जीवन का मार्ग दिखाया।
“उत्तिष्ठत जाग्रत” का आह्वान चेतना के जागरण का शाश्वत उद्घोष है। इन 80 वर्षों में भारत ने अनेक चुनौतियों का सामना किया, गरीबी, अशिक्षा, विभाजन की पीड़ा, युद्ध, सामाजिक विषमताएँ और विकास की कठिन राह। लेकिन भारत रुका नहीं। विज्ञान से अंतरिक्ष तक, कृषि से प्रौद्योगिकी तक, शिक्षा से चिकित्सा तक, खेल से वैश्विक नेतृत्व तक भारत ने निरंतर अपनी सामर्थ्य का परिचय दिया।
आज स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में आइए, हम स्वतंत्रता के मूल्यों को अपने जीवन में उतारें। अपने भीतर के भय से स्वतंत्र हों, अज्ञान से स्वतंत्र हों, स्वार्थ से स्वतंत्र हों और विभाजनकारी विचारों से स्वतंत्र होकर एक भारत, श्रेष्ठ भारत और विश्वकल्याणकारी भारत के निर्माण में अपना योगदान दें। परमार्थ निकेतन की ओर से समस्त राष्ट्रवासियों को 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma Working in journalism since 1985 as the first woman journalist of Uttarakhand. From 1989 for 36 years, she provided her strong services for India's top news agency PTI. Working for a long period of thirty-six years for PTI, he got her pen ironed on many important occasions, in which, by staying in Tehri for two months, positive reporting on Tehri Dam, which was in crisis of controversies, paved the way for construction with the power of her pen. Delivered.

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