365 दिन अन्नक्षेत्र सेवा
परमार्थ निकेतन में साधु-संतों और निराश्रितों के लिए भंडारा बना मानसून में अनेकों का सहारा
सेवा का कोई ऑफ-सीजन नहीं होता
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश। भारतीय सनातन परंपरा में सेवा को साधना, करुणा और आत्मशुद्धि का मार्ग है। जब किसी भूखे के हाथ में अन्न पहुँचता है, किसी संत को सम्मानपूर्वक भोजन मिलता है और किसी निराश्रित के जीवन में अपनत्व का भाव जागता है, तब सेवा केवल शरीर का पोषण नहीं करती, बल्कि समाज में संवेदना और मानवता का पोषण करती है। इसी सनातन भाव को साकार करता है परमार्थ निकेतन का 365 दिन चलने वाला भंडारा, जहाँ साधु-संतों, तपस्वियों, जरूरतमंदों और निराश्रितजनों के लिए नियमित रूप से भोजन सेवा की जाती है।
भंडारा सेवा अन्न वितरण के साथ ही ‘अन्न ही जीवन है और अन्नदान महादान है’ की भारतीय परंपरा का जीवंत स्वरूप है। विशेष रूप से मानसून के दौरान जब वर्षा और अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ जरूरतमंदों के लिए जीवन को और चुनौतीपूर्ण बना देती हैं, तब यह अन्नसेवा अनेकों के लिए सहारा बनती है।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के अवतरण दिवस 3 जून से इस विशेष भंडारा सेवा को और व्यापक रूप में गति मिली। उनके जीवन का मूल संदेश ही सेवा, साधना और संस्कारों के समन्वय का संदेश है। उनके लिए आध्यात्मिकता केवल ध्यान और पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि वह जीवन में करुणा, सेवा, पर्यावरण संरक्षण और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता के रूप में प्रकट होनी चाहिए।
सनातन संस्कृति में कहा गया है “अन्नं ब्रह्म” अर्थात् अन्न को ब्रह्मस्वरूप माना गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्न के प्रति अत्यंत गहरा सम्मान व्यक्त करते हुए कहा गया “अन्नं न निन्द्यात्”, अर्थात अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। भारतीय परंपरा में अतिथि, साधु, संत और जरूरतमंद को भोजन कराना इसलिए केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि धर्म और साधना का अंग रहा है। परमार्थ निकेतन का यह भंडारा उसी शास्त्रोक्त भावना को आधुनिक सामाजिक संवेदना के साथ जोड़ता है। यहाँ सेवा का अर्थ केवल भोजन परोसना नहीं, बल्कि सम्मान के साथ भोजन कराना है। क्योंकि किसी जरूरतमंद को अन्न देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके स्वाभिमान और गरिमा का सम्मान करते हुए अन्न देना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
मानसून के दिनों में इस सेवा का महत्व और बढ़ जाता है। वर्षा के कारण दैनिक जीवन प्रभावित होता है और खुले में रहने वाले तथा आश्रयविहीन लोगों के लिए भोजन की उपलब्धता भी कठिन हो सकती है। ऐसे समय में नियमित भंडारा उनके लिए आश्वासन का संदेश बनता है “आप अकेले नहीं हैं, समाज आपके साथ है।”
पूज्य स्वामी जी सदैव सेवा को साधना से जोड़ते रहे हैं। सेवा में जब अहंकार नहीं, समर्पण होता है; जब प्रदर्शन नहीं, करुणा होती है; जब देने वाले और पाने वाले का भेद मिट जाता है, तब सेवा साधना बन जाती है। यही भारतीय ऋषि परंपरा का संदेश है, नर सेवा ही नारायण सेवा है।
आज जब आधुनिक समाज में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच अकेलापन, असमानता और सामाजिक दूरी जैसी चुनौतियाँ सामने हैं, ऐसे समय में अन्नसेवा हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है। यह हमें याद दिलाती है कि विकास केवल आर्थिक प्रगति का नाम नहीं; विकास तब सार्थक है जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान, सुरक्षा और भोजन का अनुभव करे।
परमार्थ निकेतन की यह 365 दिन की सेवा इसलिए भी विशेष है क्योंकि सेवा किसी एक पर्व, उत्सव या विशेष अवसर तक सीमित नहीं है। सेवा का कोई ऑफ-सीजन नहीं होता। वर्षा हो, गर्मी हो या सर्दी, करुणा का दीप निरंतर जलता रहे, यही सनातन सेवा का भाव है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के अवतरण दिवस से प्रारंभ हुई यह भंडारा सेवा उनके जीवन-संदेश को भी अभिव्यक्त करती है साधना से संवेदना, संवेदना से सेवा और सेवा से समाज में सद्भाव।
365 दिन चलने वाली यह अन्नसेवा वस्तुतः सनातन संस्कृति के “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के संकल्प को धरातल पर उतारने वाली एक सतत साधना है, एक ऐसी साधना, जिसमें मंत्र भी है, सेवा भी; भक्ति भी है, करुणा भी; अन्न भी है और आत्मीयता भी।