श्रावणी पर्व के पूर्व परमार्थ निकेतन में गंगा तट पर जीवंत होती ऋषि-गुरुकुल परंपरा*

*माँ गंगा की निर्मल धारा के साथ प्रवाहित हो रही संस्कारों, संस्कृति और सनातन मूल्यों की दिव्य गंगा*

ऋषिकेश। श्रावण मास की पावन बेला में हिमालय की गोद और माँ गंगा के पवित्र तट पर स्थित परमार्थ निकेतन इन दिनों आध्यात्मिक ऊर्जा, भारतीय संस्कृति और गुरुकुल परंपरा की अनुपम छटा से आलोकित है। श्रावणी पर्व के पूर्व परमार्थ निकेतन का गुरुकुल परिसर ऐसा दिव्य और अलौकिक दृश्य प्रस्तुत कर रहा है, जहाँ प्रकृति की पवित्रता, गंगा की निर्मलता, वेद-मंत्रों की गूंज और बाल ऋषियों के संस्कार मिलकर भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा का जीवंत दर्शन कराते हैं।

माँ गंगा की कल-कल करती धारा के साथ यहाँ केवल जल नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, साधना और सेवा की दिव्य धारा भी प्रवाहित हो रही है। गंगा भारतीय संस्कृति में केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन, चेतना और संस्कृति की सनातन वाहिनी हैं। उसी प्रकार गुरुकुल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने, चरित्र निर्माण करने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने की पवित्र भूमि है।

श्रावण मास भगवान शिव की आराधना, तप, साधना और आत्मशुद्धि का पावन काल माना जाता है। इस अवसर पर गुरुकुल के बाल ऋषियों द्वारा प्रातःकालीन अनुशासन, योग, ध्यान, वेदाध्ययन, संस्कृत अध्ययन और आध्यात्मिक साधना का दृश्य वातावरण को विशेष दिव्यता प्रदान करता है। बाल ऋषियों के मुख से उच्चरित वैदिक मंत्रों की स्वर-लहरियाँ जब माँ गंगा की धारा से मिलती हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो हिमालय, गंगा और गुरुकुलकृतीनों मिलकर सनातन संस्कृति का एक जीवंत संगीत रच रहे हों।

परमार्थ निकेतन की गुरुकुल परंपरा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि शिक्षा को संस्कारों से, ज्ञान को करुणा से और जीवन को सेवा से जोड़ना है। यहाँ बाल ऋषियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, योग, ध्यान, संस्कृत, वेद-वेदांग और नैतिक मूल्यों के साथ आधुनिक शिक्षा की दिशा में भी तैयार किया जाता है। यह शिक्षा उन्हें केवल एक सफल व्यक्ति बनने के लिए नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, संस्कारित, जिम्मेदार और राष्ट्र एवं समाज के प्रति समर्पित नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी सदैव कहते हैं कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी युवा पीढ़ी के संस्कारों में निहित है। यदि हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, प्रकृति, नदियों, परंपराओं और मानवीय मूल्यों से जुड़ेगी तो भारत का भविष्य और अधिक उज्ज्वल होगा। गुरुकुल इसी संकल्प का जीवंत माध्यम है, जहाँ शिक्षा के साथ संस्कार, साधना के साथ सेवा और ज्ञान के साथ करुणा का समन्वय किया जाता है।

श्रावणी पर्व का संदेश भी इसी आंतरिक शुद्धि और जागरण से जुड़ा है। भगवान शिव की आराधना हमें त्याग, तप, संयम और करुणा का मार्ग दिखाती है। कांवड़ यात्रा से लेकर शिवाभिषेक तक श्रद्धालु जल, आस्था और संकल्प के साथ भगवान शिव का स्मरण करते हैं। ऐसे पावन समय में गुरुकुल के बाल ऋषियों की साधना इस पर्व को और अधिक अर्थपूर्ण बना देती है।

परमार्थ निकेतन का यह दृश्य एक गहरा संदेश भी देता हैकृजिस प्रकार माँ गंगा अपनी धारा से धरती को सींचती हैं, उसी प्रकार संस्कारों की धारा समाज और राष्ट्र के भविष्य को सींचती है। गंगा की निर्मलता हमें प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती है और गुरुकुल की परंपरा हमें अपनी संस्कृति और मूल्यों के संरक्षण का।

आज जब आधुनिक जीवन की तीव्र गति के बीच नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है, ऐसे समय में गुरुकुल परंपरा का महत्व और भी बढ़ जाता है। गुरुकुल बच्चों को यह अनुभव कराता है कि भारतीय संस्कृति केवल पुस्तकों में पढ़ने का विषय नहीं, बल्कि जीने की कला हैकृप्रकृति का सम्मान करना, माता-पिता और गुरु का आदर करना, भोजन के प्रति कृतज्ञ होना, नदियों को माँ मानना, प्राणियों के प्रति करुणा रखना और समाज के लिए सेवा का भाव रखना ही वास्तविक शिक्षा है।

श्रावणी पर्व के पूर्व परमार्थ निकेतन का यह दिव्य वातावरण मानो सम्पूर्ण समाज को एक साथ तीन पवित्र संदेश दे रहा हैकृगंगा को निर्मल रखें, संस्कृति को जीवंत रखें और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ।

गंगा तट पर गुरुकुल के बाल ऋषियों की साधना, प्रार्थना और अनुशासन को देखकर सहज ही अनुभव होता है कि भारत की सनातन परंपरा आज भी जीवंत है। यह परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की आधारशिला भी है।

श्रावण की पावन बेला में परमार्थ निकेतन से यही दिव्य संदेश प्रवाहित हो रहा हैकृ

“माँ गंगा की धारा को निर्मल रखें, अपने अंतर्मन को पवित्र रखें और संस्कारों की दिव्य गंगा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित करते रहें।”

गंगा भी हमारी धरोहर है, गुरुकुल भी हमारी धरोहर है और संस्कार भी हमारी धरोहर हैं। इन्हीं तीनों के संरक्षण में भारत के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग निहित है।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma – Senior Woman Journalist

Shashi Sharma has been active in journalism since 1985, holding the distinction of being Uttarakhand's first female journalist.

For 36 years, starting in 1989, she rendered distinguished service to India's premier news agency, PTI. During this long tenure, she demonstrated the power of her writing on numerous significant occasions; notably, she spent two months in Tehri reporting positively on the Tehri Dam—which was then mired in controversy—and used her pen to help pave the way for its construction.

Currently, Mrs. Shashi Sharma runs the news portal *Newsok24.com* and serves as the editor of the weekly newspaper *Desh Nirdesh*; she is also a registered anchor and commentator for Delhi Doordarshan.

शशि शर्मा वरिष्ठ महिला पत्रकार शशि शर्मा उत्तराखंड की पहली महिला पत्रकार के तौर पर 1985 से पत्रकारिता में कार्यरत हैं। 1989 से 36 वर्षों तक उन्होंने भारत की शीर्ष समाचार एजेंसी पीटीआई के लिए अपनी सशक्त सेवाएं दीं। छत्तीस वर्षों की लंबी अवधि तक पीटीआई के लिए काम करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर अपनी कलम का लोहा मनवाया, जिसमें दो महीने तक टिहरी में रहकर विवादों के संकट में रहे टिहरी बांध पर सकारात्मक रिपोर्टिंग कर अपनी कलम की ताकत से निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में श्रीमती शशि शर्मा Newsok24 com न्यूज पोर्टल को चला रहीं हैं और साप्ताहिक समाचार पत्र देश निर्देश की सम्पादक होने के साथ ही दिल्ली दूरदर्शन की रजिस्टर्ड एंकर और कमेंटेटर भी हैं।

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