श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रकाश पर्व की शुभकामनायें
गुरुवाणी, एकत्व, सेवा और मानवता का संदेश
भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 12 सितम्बर। भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं से नहीं, बल्कि उस विराट ज्ञान-चेतना से है जिसने हजारों वर्षों से मानव जीवन के सबसे गहरे प्रश्नों पर चिंतन किया है। जीवन क्या है, सत्य क्या है, मनुष्य का प्रकृति और परमात्मा से क्या संबंध है, धर्म क्या है, कर्तव्य क्या है और मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है, इन प्रश्नों के उत्तर भारत की विशाल ज्ञानपरंपरा में निरंतर खोजे और अनुभव किए गए हैं।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, जैन आगम एवं ग्रंथ, बौद्ध त्रिपिटक तथा गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित गुरुओं, संतों और भक्तों की वाणी भारत की श्रेष्ठ ज्ञाननिधि है। यह ज्ञान किसी एक व्यक्ति, एक काल, एक पंथ या एक समुदाय की संपत्ति नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए भारत का अमूल्य आध्यात्मिक उपहार है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की ज्ञानपरंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सत्य को किसी एक दिशा में सीमित नहीं किया गया। वेदों ने ऋत और सत्य की खोज की, उपनिषदों ने आत्मा और ब्रह्म के रहस्य को उद्घाटित किया, पुराणों ने गूढ़ आध्यात्मिक सिद्धांतों को कथा और चरित्रों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। रामायण ने मर्यादा, करुणा, त्याग और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाया, तो महाभारत ने जीवन की जटिलताओं के बीच धर्म की सूक्ष्मता को समझाया। श्रीमद्भगवद्गीता ने कर्म, ज्ञान, भक्ति और समत्व के माध्यम से जीवन को योगमय बनाने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब में गुरुओं तथा संत-भक्त परंपरा की वाणी ने एकत्व, नाम-स्मरण, सेवा, विनम्रता और मानव-समता का दिव्य संदेश दिया। यह विविधता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक समृद्धि का प्रमाण है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत ने कभी यह नहीं कहा कि सत्य केवल मेरे पास है, भारत ने कहा, सत्य को जानो, सत्य को जियो और सत्य की ओर अग्रसर हो। यही कारण है कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा में प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता भी है और अनुभूति की गहराई भी। यहां ज्ञान केवल पुस्तकों में सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं रहा, बल्कि उसे जीवन में उतारने की साधना है।
उन्होंने कहा कि भारत की इस ज्ञाननिधि का मूल संदेश मानवता को जोड़ना है। अलग-अलग साधना-पद्धतियां, अलग-अलग भाषाएं, अलग-अलग परंपराएं और अलग-अलग आराधना-मार्ग होते हुए भी इनके केंद्र में सत्य, करुणा, आत्मसंयम, सेवा, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव और समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना दिखाई देती है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि “भारत की आध्यात्मिक परंपरा एक विराट ज्ञान-गंगा है। वेद उसके उद्गम की दिव्य ध्वनि हैं, उपनिषद उसकी गहराई हैं, रामायण और महाभारत उसका जीवन-संवाद हैं, गीता उसका कर्मयोग है, जैन और बौद्ध परंपराएं उसकी करुणा और अहिंसा की धाराएं हैं तथा गुरु परंपरा उसकी प्रेम, सेवा और समता की निर्मल धारा है। इन सभी धाराओं का संगम मानवता के कल्याण में होता है।”
उन्होंने कहा कि आज जब विश्व अनेक प्रकार के संघर्षों, मानसिक अशांति, पर्यावरणीय संकट, हिंसा, असहिष्णुता और मूल्य-संकट से जूझ रहा है, तब भारत की इस ज्ञानपरंपरा को केवल इतिहास के अध्याय के रूप में देखने के बजाय जीवन के समाधान के रूप में समझने की आवश्यकता है। योग हमें स्वयं से जोड़ता है, गीता हमें कर्तव्य का बोध कराती है, उपनिषद हमें अपने भीतर के सत्य की खोज के लिए प्रेरित करते हैं तथा गुरु परंपरा सेवा, समता और एकत्व की प्रेरणा देती है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता है। “हमें अपनी ज्ञानपरंपरा को केवल पूजना नहीं है, उसे जीना है, केवल उद्धृत नहीं करना है, उसे आत्मसात करना है, केवल अपनी पीढ़ी तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और पूरे विश्व तक पहुंचाना है।”
उन्होंने आह्वान किया कि भारत की नई पीढ़ी अपने प्राचीन ग्रंथों और संत-वाणी से जुड़े, उनके मूल संदेश को समझे और आधुनिक जीवन की चुनौतियों के संदर्भ में उनके ज्ञान को आत्मसात करे। जब ज्ञान आचरण बनता है, तब संस्कृति जीवंत होती है और जब संस्कृति करुणा, सेवा तथा समता से जुड़ती है, तब वह विश्वकल्याण का माध्यम बनती है।
भारत की यह ज्ञाननिधि किसी एक युग की विरासत नहीं, बल्कि निरंतर प्रवाहित होती चेतना है, एक ऐसी ज्ञान-गंगा, जिसमें अनेक परंपराओं की धाराएं मिलकर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और समस्त मानवता के कल्याण का विराट संदेश देती हैं।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma – Senior Woman Journalist

Shashi Sharma has been active in journalism since 1985, holding the distinction of being Uttarakhand's first female journalist.

For 36 years, starting in 1989, she rendered distinguished service to India's premier news agency, PTI. During this long tenure, she demonstrated the power of her writing on numerous significant occasions; notably, she spent two months in Tehri reporting positively on the Tehri Dam—which was then mired in controversy—and used her pen to help pave the way for its construction.

Currently, Mrs. Shashi Sharma runs the news portal *Newsok24.com* and serves as the editor of the weekly newspaper *Desh Nirdesh*; she is also a registered anchor and commentator for Delhi Doordarshan.

शशि शर्मा वरिष्ठ महिला पत्रकार शशि शर्मा उत्तराखंड की पहली महिला पत्रकार के तौर पर 1985 से पत्रकारिता में कार्यरत हैं। 1989 से 36 वर्षों तक उन्होंने भारत की शीर्ष समाचार एजेंसी पीटीआई के लिए अपनी सशक्त सेवाएं दीं। छत्तीस वर्षों की लंबी अवधि तक पीटीआई के लिए काम करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर अपनी कलम का लोहा मनवाया, जिसमें दो महीने तक टिहरी में रहकर विवादों के संकट में रहे टिहरी बांध पर सकारात्मक रिपोर्टिंग कर अपनी कलम की ताकत से निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में श्रीमती शशि शर्मा Newsok24 com न्यूज पोर्टल को चला रहीं हैं और साप्ताहिक समाचार पत्र देश निर्देश की सम्पादक होने के साथ ही दिल्ली दूरदर्शन की रजिस्टर्ड एंकर और कमेंटेटर भी हैं।

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