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परमार्थ निकेतन में ‘कला प्रवाह’ का भव्य शुभारंभ*

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परमार्थ गंगा तट पर भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का दिव्य संगम*
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संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली ( संगीत, नृत्य एवं नाटक की राष्ट्रीय अकादमी), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की स्वायŸा संस्था एवं संस्कृति विभाग, उत्तराखंड सरकार के सहयोग से आयोजित कला प्रवाह*
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परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में श्री हिमांशु डामोरा जी, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय जी तथा पद्मश्री प्रख्यात लोक गायिका डॉ. बसंती बिष्ट जी और अनेक विभूतियों ने किया दीप प्रज्वलन*
ऋषिकेश, 5 नवम्बर। देवभूमि उत्तराखंड की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक धरा पर स्थित परमार्थ निकेतन में भारतीय कला, संगीत, नृत्य और सनातन संस्कृति के अद्भुत संगम ‘कला प्रवाह, ए सीरीज़ ऑफ टेम्पल फेस्टिवल्स’ का भव्य शुभारंभ हुआ। परमार्थ निकेतन में संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा उत्तराखंड सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित इस दो दिवसीय सांस्कृतिक महोत्सव में भारतीय कला की समृद्ध परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक विविधता की अनुपम झलक देखने को मिली।
महोत्सव का शुभारंभ हनुमान चालीसा पाठ एवं परमार्थ निकेतन के ऋषिकुमारों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार से हुआ। परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया। इसके पश्चात संगीत नाटक अकादमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित श्री हिमांशु डामोरा जी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए सभी का अभिनंदन किया।
उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध लोक गायिका हेमा नेगी जी करासी ने अपने भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति से वातावरण को भावविभोर कर दिया। शंखनाद के साथ परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी का स्वागत किया गया। विशिष्ट अतिथियों के पावन सान्निध्य में दीप प्रज्वलन कर महोत्सव का विधिवत शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय जी तथा पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात लोक गायिका एवं संगीत नाटक अकादमी की शासी परिषद की सदस्य विदुषी डॉ. बसंती बिष्ट जी और अनेक विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
महोत्सव में संकीर्तन की मधुर स्वर लहरियों के बीच परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी ने आशीर्वचन एवं दिव्य संदेश दिया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की श्रृंखला में महाराष्ट्र के रतन मोहन शर्मा जी द्वारा हवेली संगीत तथा दिल्ली के कथक केंद्र द्वारा ‘नमामि गंगे’ विषय पर कथक नृत्य की प्रस्तुति दी। इन प्रस्तुतियों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की शाश्वत परंपरा को गंगा की दिव्य धारा एवं आध्यात्मिक चेतना से जोड़ा।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की कला, संगीत और संस्कृति भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। हमारी कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि साधना, संस्कार और ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है। जब संगीत में भक्ति, नृत्य में भाव और कला में आध्यात्मिकता समाहित होती है, तब वह हृदयों को जोड़ने और समाज में सद्भाव जगाने का माध्यम बन जाती है। मां गंगा की पावन धारा की तरह हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ भी निरंतर प्रवाहित रहें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचें।
डा साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि कला की कोई भाषा या सीमा नहीं होती, कला सीधे हृदय से संवाद करती है। संगीत, नृत्य और भक्ति हमें अपनी आंतरिक सुंदरता, शांति और एकत्व से जोड़ते हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। ऐसे आयोजन हमारी समृद्ध विरासत को जीवंत रखने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। जब कला सेवा, साधना और समर्पण से जुड़ती है, तब वह केवल प्रस्तुति नहीं रहती, बल्कि परिवर्तन और चेतना का माध्यम बन जाती है।
‘कला प्रवाह’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की विविध कलात्मक परंपराओं, मंदिर संस्कृति, आध्यात्मिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को एक साझा मंच पर प्रतिष्ठित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है। यह महोत्सव नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और भारतीय कला की अमूल्य धरोहर से जोड़ने के साथ ही कलाकारों को अपनी साधना एवं प्रतिभा के प्रदर्शन का अवसर प्रदान कर रही है।
परमार्थ निकेतन की पावन भूमि पर मां गंगा के सान्निध्य में आयोजित यह महोत्सव भारतीय संस्कृति की उस जीवंत परंपरा का उत्सव है, जहाँ कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि साधना है; संगीत केवल स्वर नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का माध्यम है और नृत्य केवल गति नहीं, बल्कि भाव, भक्ति एवं चेतना की अभिव्यक्ति है।
दो दिवसीय महोत्सव में परमार्थ निकेतन के ऋषिकुमारों द्वारा, वैदिक मंत्रोच्चारण, हेमा नेगी करासी जी द्वारा उत्तराखंड़ भजन, श्री रŸान मोहन शर्मा जी, महाराष्ट्र द्वारा हवेली संगीत, कथक केन्द्र दिल्ली द्वारा कथक नृत्य, नमामि गंगे, सुचित्रा बालासुब्रमण्यम, तमिलनाडु-हरिकथा, पंतजलि विश्वविद्यालय, उत्तराखंड़ द्वारा भरतनाट्यम एवं कथक, कार्तिक दास बाउल, पश्चिम बंगाल द्वारा बाउल संगीत आदि ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
