History of kanwad mela,कुछ 100, से कैसे पहुंची काँवड़ियों की संख्या करोड़ों में-जानिए काँवड़ का इतिहासकाँवड़ मेला 22023 में शिव का जलाभिषेक करते डीजीपी उतराखंड अशोक कुमार और पत्नी अलकनंदा2023 काँवड़ मेले की कमान इनके हाथ रही |

लेख :- शशि शर्मा हरिद्वार

History of kanwad mela,कुछ 100, से कैसे पहुंची काँवड़ियों की संख्या करोड़ों में-जानिए काँवड़ का इतिहास

लोकगीतों से टेप रिकॉर्डर,और डैक से डीजे तक पहुंचा काँवड़, आकर्षक भी और घातक भी|

                                      लेख :- शशि शर्मा हरिद्वार

काँवड़ धार्मिक स्तर पर काँवड़ ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों का एककार स्वरूप माना जाता है

मनोकामना की पूर्ति की प्रतिपूर्ति, और मनौतियों के संधान का पर्याय है काँवड़,

काँवड़ ले जाने वाले को भगवान शिव के समान सहनशील होना चाहिए

भगवान शिव को सृष्टि के प्रारंभ से ही देवता और दानव दोनों ही समान भाव से पूजते आए हैं, राम हो या रावण भगवान शंकर सभी के आराध्य रहे हैं।

आसुरी शक्तियों के नियंत्रक माने जाने वाले शिव की रात्रि में उपासना का विधान है, भगवान शिव की उपासना और आराधना से जुड़ी है काँवड़,मनोकामना की पूर्ति की प्रतिपूर्ति और मनौतियों के संधान का पर्याय है काँवड़,
भौतिक रूप से भले ही काँवड़ शब्द का अर्थ शिव के प्रतीक माने जाने वाली मनौतियों से जुड़ता हो किंतु धार्मिक स्तर पर कावड़ ब्रह्मा विष्णु और महेश यानी शिव का एक आकार स्वरूप माना जाता है।

“कश्च,वश्च्,अश्च, इतिः काँवरः ” यानी ब्रह्मा विष्णु महेश की शक्ति जिसमें विद्यमान है वह है कांवर,कांवर से कांवड़ का शाब्दिक परिवर्तन भाषाई अपभ्रंश कहा जा सकता है।

काँवड़, धार्मिक पक्ष कहता है कि काँवड़ शिव का साक्षात स्वरूप है श्रीमद्भागवत के 21 वें अध्याय में वेणु गीत में भगवान कृष्ण की बांस की बांसुरी को साक्षात रुद्र कहा गया है,काँवड़ का स्वरूप देखें तो, एक बांस के दोनों छोरों पर बने गंगाजल भरे 2कलश,बांस यानी स्वयं शिव स्वरूप रूद्र, पहला कलश ब्रह्म स्वरूप,दूजा कलश विष्णु कलश,कहा जाता है और काँवड़ उठाने वाले को कांवरिया यानी शिव साधक कहा जाता है।

धार्मिक ग्रंथ कहते हैं कि काँवड़ ले जाने वाले को भगवान शिव के समान सहनशील होना चाहिए, मन कर्म और वाणी पर अंकुश होना चाहिए तभी काँवड़ उठाने का पुण्य फल प्राप्त किया जा सकता है धार्मिक ग्रंथ कहते हैं कि कांवड़ उठाने वाला काँवड़िया तपस्वी होता है क्योंकि उसे कठोर तप का पालन करना होता है।

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History of kanwad mela, दूदहेश्वर महादेव का जलाभिषेक  करते पीठाधीश्वर महंत नारायण giri

काँवड़िए चार प्रकार के संकल्प लेते हैं, यह संकल्प कोई भी श्रद्धालु शिवभक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार लेता है, यूं तो काँवड़ पैदल ही ले जाने की परंपरा है, किंतु चार रीतियों से काँवड़ ले जाना चलन में है|

जिसमें खड़ी काँवड़ पड़ी काँवड़ झूला काँवड़ और लेटी काँवड़ शामिल है,लेटी काँवड़ सबसे कठिन होती है इसमें काँवड़ ले जाने वाला श्रद्धालु भक्त जल भरने के स्थान से ही धरती पर लेट लेट कर अपने साथी कांवडिया की सहायता से अपने गंतव्य तक पहुंचता है।

खड़ी काँवड़ का संकल्प लेने वाले रास्ते भर काँवड़ को लेकर खड़ा रहकर अपने सहयोगी के साथ अपने अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, झूला काँवड़ को किसी लटकाने वाले स्थान पर रखा जा सकता है। रास्ते में किसी भी स्थान पर काँवड़ को लटकाने की अनुमति होती है।

बदलते समय और सुविधाओं के अनुरूप काँवड़ ले जाने का एक और प्रचलन पिछले कुछ सालों से तेजी से बढ़ा है समय के अभाव में कामकाजी लोग अपने कावड़ के प्रारंभ और अंत तक एक अवधि निश्चित करते हैं मनौती मानी जाती है कि 10 घंटे में काँवड़ लेकर भगवान शंकर को जल चढ़ाया जाएगा। काँवड़ के इस स्वरूप को डाक काँवड़ का नाम दे दिया गया,80 के दशक तक डाक काँवड़ आकार ले चुकी थी लेकिन तब डाक काँवड़ का अर्थ था बेटन रेस की तरह एक दूसरे को दौड़ते हुए काँवड़ पकड़ना,फिर डाक काँवड़ सुविधा के अनुसार गंगा जाली में परिवर्तित हुई और काँवड़ की जगह दौड़ते हुए गंगाजलि केन पास की जाने का प्रचलन आया, जो 80 से 85 के आसपास तक रहाऔर उसके बाद मोटरसाइकिलें और फिर डीजे का दौर और ट्रकों से काँवड़ ले जाने का प्रचलन शुरु हुआ जो हर साल विकराल होता गया, इस परचलन का खासा विरोध भी हुआ लेकिन परिवर्तित होती परिस्थतियों में सब शांत हो गया लंगर शुरु हो गए, और इसके साथ ही काँवड़ मौज मस्ती का माध्यम बन गया |

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शिव लिंग दूदहेश्वर महादेव

70 से 80 के दशक तक काँवड़ मेलों का आकार बहुत छोटा था,बिल्कुल साधारण, बहुत सीधे साढ़े से धोती कुर्ता और पगड़ी पहने लोग, जिनमें हरियाणा और राजस्थान की विश भूषा हुआ करती थी, पैरों में घुंगरू बांधे आते और लोक गीत सरीखे भजन गाते हुए साधारण छोटी सी काँवड़ बांस के डंडे के दोनों और बांस की टोकरईऊओं में राखी गंगा जल की छोटी छोटी कांच की शीशियों में जल भर कर साधारण कपड़े से और प्लास्टिक के खिलोनों से सजी काँवड़ ले जाते कुछ काँवड़िए थे जो रात में बैल गाड़ियों से सफर कर हरिद्वार पहुंचे थे,उनके बैलों के गले में बंधी घंटियाँ सवेरे तड़के ही काँवड़ियों के पहुँचने का संदेश दे दिया करती थीं, ये लोग कांवड़ में जल भरकर हरिद्वार से पैदल रवाना होते थे। जिन की अधिकतम संख्या पूरे श्रावण मास के दौरान 50 से 100 होती थी। पैरों में बने घुंघरू की छन-छन और भक्ति लोकगीतों के सहारे यह लोग अपना सफर तय करते थे।
पहले काँवड़िए मेरठ के पूरा महादेव के मंदिर में ही जल चढ़ाने जाते थे जो बाद में अपने अपने मनौती स्थलों ताकि विस्तृत हो गया|
पूरा महादेव के मंदिर में कांच की शीशियों में भरे गंगा जल को भगवान पर चढ़ाने पर प्रति बंध लग गया कारण था कांच की शीशियों के कारण पूरा महादेव के मंदिर में हुआ बड़ा हादसा, भरी भीड़ के कारण लोगों ने भगवान यक न पहुँच पाने के कारण गंगा जल की शीशियाँ शिवलिंग पर दूर से ही फेंकी जिससे लोगों को चोटें आने से भगदड़ मच गई और एक बुरा इतिहास लिखा गया तब से कांच के शीशियों में जल ले जाने पर प्रतिबंध लग गया |

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History of kanwad mela,कुछ 100, से कैसे पहुंची काँवड़ियों की संख्या करोड़ों में-जानिए काँवड़ का इतिहास

बदलते समय के साथ 80 के दशक तक आते-आते अधेड़ कांवरियों की जगह युवाओं ने ले ली और लोकगीतों की जगह टेप रिकॉर्डर ने ले लिया और भक्ति के जगह जोश ने लेली,काँवड़ धीरे-धीरे शासन-प्रशासन का सिरदर्द बन गया जब डीजे आया। धार्मिक पर्व स्वच्छता और विलासिता का पर्याय बना तो सरकारी स्तर पर अंकुश लगाने के प्रयासों ने नियम कायदे कानून का प्रतिपादन भी किया।

एक तरफ जहां कावड़ मेला अरबों रुपए के व्यापार का केंद्र है वही काँवड़ के कारण यातायात का अवरोध शिक्षा चिकित्सा और उत्पादन तथा उत्पादों को प्रभावित करता है।

मेले के दौरान कई प्रदेशों हरियाणा पंजाब राजस्थान की संस्कृतियाँ एकाकार होती हैं,भक्ति और श्रद्धा का विस्तार होता है, परंतु कई असामाजिक तत्व और असामाजिक व्यवसाय भी काम की आड़ में छुपकर विस्तार पाते हैं। कहा जाता है समाज में जहां राम है वहां रावण भी है जहां अच्छाई है वहां बुराई भी है हमारी रूढ़ियाँ हो या परंपराएं सभी का कहना है कि बुराई पर हमेशाअच्छाई ने विजय पाई है |

काँवड़ के विस्तार ने हिन्दू धर्म को विस्तार दिया है, धर्म चाहे कोई भी हो हमेशा सहिष्णुता सिखाता है, सहिष्णु समाज मानवता के प्रति संवेदनशील और विनम्र समाज माना जाता है।

इसके अलावा साल में दो बार होने वाले कांवड़ मेले की आमदनी से, केवल हरिद्वार ही नहीं, आसपास के कई जनपदों के निवासी,अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों बहन बेटी की शादी, आवश्यक और अतिरिक्त चिकित्सा खर्चे, वगैरा करने में समर्थ होते हैं।

जिससे कई सामाजिक दायित्वों की पूर्ति में भी कावड़ मेला अनायास ही सहायक बन जाता है,कई व्यवसाय कांवड़ मेले से विस्तार पाकर लोगों के सपने सच कर जाते हैं। काँवड़ मेले जैसा सांप्रदायिक सहिष्णुता का और कोई उदाहरण नहीं हो सकता कि हिंदुओं के पावन पर्व पर उठाई जाने वाली काँवड़े और काँवड़ सजाने का अधिकांश समान मुस्लिम संप्रदाय द्वारा सहर्ष बनाया जाता है जो आपसी सौहार्द की बड़ी मिसाल है।

शिव पुराण में मोक्ष प्राप्ति के चार रास्तों में से एक रास्ता महाशिवरात्रि का व्रत रखना बताया गया है। नारद पुराण और स्कंद पुराण में कहा गया है कि शिव का जलाभिषेक,फूल फल बिल्वपत्र चंदन धूप दीप शहद की शक्कर से भगवान शिव की शिवरात्रि पर आराधना पुनर्जन्म से मुक्ति देती है।

श्रावण मास की चतुर्दशी तिथि को भगवान शंकर और पार्वती के विवाह से जोड़कर देखा जाता है। सावन का महीना भगवान शिव और गौरी के प्रणय का मास माना जाता है,सावन मास के सोमवार को भगवान शंकर के जलाभिषेक का धार्मिक स्थल पर विशेष महत्व है।

 History of kanwad mela,कुछ 100, से कैसे पहुंची काँवड़ियों की संख्या करोड़ों में-जानिए काँवड़ का इतिहास
History of kanwad mela,कुछ 100, से कैसे पहुंची काँवड़ियों की संख्या करोड़ों में-जानिए काँवड़ का इतिहास

 

श्रावण मास में दूर-दूर से आकर शिवभक्त हरिद्वार की मंदिर बिल्केश्वर मंदिर, नीलेश्वर महादेव मंदिर, कनखल स्थित तिलभांडेश्वर मंदिर, और ऋषिकेश के नीलकंठ महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करते।

हरिद्वार से मेरठ के पुरा महादेव मंदिर तक कांवड़ में जल ले जाकर भगवान का जलाभिषेक करने की विशेष महत्ता मानी जाती है। कहा जाता है कि पुरा महादेव मेरठ के पुरा में स्थित भगवान शिव का मंदिर है जिसे महर्षि परशुराम की तपस्थली माना जाता है। कहा जाता है कि अपनी माता और सैकड़ों क्षत्रियों के वध के पाप से मुक्ति के लिए महर्षि परशुराम ने पुरा महादेव में 30 दिन तक गंगा जल से भगवान शिव का अभिषेक किया था।

तभी से पुरा महादेव में कांवर चढ़ाने की प्रथा प्रचलन में आई, अन्य कई कथाएं भगवान शंकर के विषपान से होने वाले ताप को देवताओं द्वारा शांत करने के लिए भगवान शंकर का जलाभिषेक किये जाने से जोड़कर भी देखते हैं। कहा जाता है कि,समुद्र मंथन सावन मास में ही हुआ था, श्रावण मास में ही भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान किया था, उनके विषपान के ताप को शांत करने के लिए सबसे पहले देवी सती और देवताओं ने भगवान शिव के मस्तक पर जल चढ़ाया तभी से भगवान शिव पर जल चढ़ाएं जाने की परंपरा चली आ रही है|
हर हर महादेव – शशि शर्मा पत्रकार हरिद्वार ओनर संपादक – Newsok24.com

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