*🌸श्री गुरूगोबिन्द सिंह शोधपीठ, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में दो दिवसीय राष्ट्रिय संगोष्ठी का आयोजन*

*🌺श्री गुरूतेगबहादुर साहिब जी के 350 वें शहीदी दिवस पर आयोजित*

*✨सिख गुरू परम्परा, धर्म, समाज, राष्ट्रीय अवधारणा पर आधारित*

*💥समापन अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखंड, कुलाधिपति लेÛ जÛ श्री गुरमीतसिंह जी एवं परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य*

*💐अध्यक्ष, गुरूद्वारा श्री हेमकुण्ड साहिब समिति, ऋषिकेश, सरदार श्री नरेन्द्र जीत सिंह बिन्द्र जी, माननीय राजयमंत्री, उत्तराखंड़, श्री श्यामवीर सैनी जी, कुलपति, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार, श्री दिनेशचन्द्र शास्त्री जी, सचिव, संस्कृत शिक्षा, उत्तराखंड़, श्री दीपक कुमार जी, कुल सचिव श्री दिनेश कुमार, जी, समन्वयक डा अजय परमार जी और विशिष्ट विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति*

*🌸श्री गुरूतेगबहादुर साहिब जी के जीवन पर आधारित कृति का विमोचन*

ऋषिकेश। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के प्रतिष्ठित श्री गुरूगोबिन्द सिंह शोधपीठ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी श्री गुरू तेगबहादुर साहिब जी के 350वें शहीदी दिवस के अवसर पर आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य सिख गुरू परंपरा, धर्म, समाज और राष्ट्रीय अवधारणा के विविध आयामों पर गहन चिंतन और शोध को प्रोत्साहित करना है।

आज समापन अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखंड, कुलाधिपति लेÛ जÛ श्री गुरमीतसिंह जी एवं परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ।

इस संगोष्ठी में देशभर के विद्वान, शोधकर्ता, समाजसेवी और युवाओं ने सहभाग किया। कार्यक्रम के दौरान सिख गुरुओं के आदर्शों, उनके व्यक्तित्व और उनके जीवनदर्शन के विभिन्न पहलुओं पर विमर्श हुआ। संगोष्ठी का समापन श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी का पूजन, दीपप्रज्वलन एवं पारंपरिक वंदना से किया गया।

संगोष्ठी के प्रथम दिन विभिन्न सत्रों में सिख गुरू परंपरा की ऐतिहासिक धरोहर, धर्म और समाज में उनकी भूमिका, और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में उनके योगदान पर विस्तारपूर्वक चर्चा हुई। शोधकर्ताओं ने प्रमाणिक स्रोतों, ग्रंथों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के माध्यम से गुरूओं के जीवन और उनके आदर्शों को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत किया। उनका शौर्य, साहस और मानवता के प्रति अटूट समर्पण का स्मरण किया।

दूसरे दिन संगोष्ठी में गुरूओं की शिक्षाओं को जीवन में उतारने के मार्गदर्शन दिए गए। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय दृष्टिकोण और समाजिक जिम्मेदारी पर ध्यान केंद्रित करते हुए विचार-विमर्श हुआ कि किस प्रकार गुरुओं के आदर्श आज के समय में मार्गदर्शन कर सकते हैं।

इस संगोष्ठी का समापन अत्यंत पावन और गौरवपूर्ण क्षण रहा। माननीय राज्यपाल, उत्तराखंड, कुलाधिपति ले. ज. श्री गुरमीत सिंह जी ने गुरू श्री गुरूगोबिन्द सिंह जी एवं गुरू तेगबहादुर साहिब जी के अद्वितीय साहस और धर्मनिष्ठा को उजागर करते हुए कहा कि उनकी शहादत केवल सिख समुदाय के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्त्रोत है। उन्होंने हमें संदेश दिया कि सत्य, धर्म और मानवता के लिए किसी भी परिस्थिति में अदम्य साहस आवश्यक है।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि यदि भारत के पास दशमेश गुरू न होते, तो यह देश आज जैसा है, वैसा नहीं होता। उस समय जब देश का ढांचा बिखर रहा था, उन्होंने अपने और अपने परिवार का बलिदान देकर देश को संवारा, यह अद्भुत और अनमोल योगदान है। इन गुरूओं की शहादत कभी किसी सियासत, किसी रियासत या किसी व्यक्तिगत विरासत के लिए नहीं थी, उनका लक्ष्य सदैव मानवता, समरसता और सद्भाव को बनाये रखना था।

इस पावन अवसर पर स्वामी जी ने दशमेश गुरूओं और उनकी शहादत को स्मरण करते हुए कहा कि उनके किए गए बलिदानों और उनके आदर्शों को सदैव याद रखना और उनसे प्रेरणा लेना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हमारी यात्रा प्रतिशोध की नहीं, बल्कि शोध, समझ और सत्कर्म की यात्रा होनी चाहिए।

स्वामी जी ने सभी को स्मरण कराया कि दशमेश गुरूओं का जीवन और त्याग हमें यह सिखाता है कि सच्चा साहस और बलिदान केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए होना चाहिए। उनका जीवन हमें मानवता, नैतिकता और एकता की ओर मार्गदर्शन करता है। ऐसे महान आदर्शों का स्मरण न केवल श्रद्धांजलि का माध्यम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सही मार्ग दिखाने वाला प्रकाशस्तंभ भी है। गुरुओं की शिक्षाएँ केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक, नैतिक और राष्ट्रीय जीवन के आदर्श भी हैं। उन्होंने कहा कि आज के युवा यदि इन आदर्शों का अनुसरण करें, तो वे न केवल अपने जीवन को दिशा दे सकते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी मजबूत और संस्कारित बना सकते हैं।

संगोष्ठी में सम्मिलित सभी विभूतियों ने गुरू तेगबहादुर साहिब जी के शौर्य, त्याग और मानवता के प्रति उनके प्रेम पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गुरू की शहादत ने हमें यह संदेश दिया कि धार्मिक सहिष्णुता, नैतिकता और मानव अधिकारों की रक्षा के लिये प्राणों का बलिदान भी कम है।

इस संगोष्ठी ने न केवल सिख गुरू परंपरा और धर्म के ऐतिहासिक महत्व पर चर्चा की, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिकता के मूल्यों को भी नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। यह आयोजन श्रद्धा, ज्ञान, गौरव और गरिमा का एक अद्भुत संगम था।

यह दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल श्रद्धांजलि का माध्यम थी, बल्कि एक प्रेरणास्त्रोत है जो आने वाली पीढ़ियों को सिख गुरुओं के आदर्शों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देगी।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma Working in journalism since 1985 as the first woman journalist of Uttarakhand. From 1989 for 36 years, she provided her strong services for India's top news agency PTI. Working for a long period of thirty-six years for PTI, he got her pen ironed on many important occasions, in which, by staying in Tehri for two months, positive reporting on Tehri Dam, which was in crisis of controversies, paved the way for construction with the power of her pen. Delivered.

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