भक्ति, प्रेम और आनंद की दिव्य परंपरा को नमन*

माँ काली के अनन्य उपासक, अद्वैत अनुभूति के मूर्त स्वरूप स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी तथा भगवान श्रीकृष्ण के परम प्रेममय भक्त, हरिनाम संकीर्तन द्वारा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जागरण के प्रणेता चैतन्य महाप्रभु की जयंती पर नमन*

श्री सुशील कुमार शिंदे जी, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री, भारत एवं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री दर्शनार्थ आये परमार्थ निकेतन*

विश्व विख्यात परमार्थ गंगा आरती में किया सहभाग*

भक्ति ही जीवन का सर्वोच्च आनंद है*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश, 18 फरवरी। माँ काली के अनन्य उपासक, अद्वैत अनुभूति के मूर्त स्वरूप स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की पावन जयंती तथा भगवान श्रीकृष्ण के परम प्रेममय भक्त, हरिनाम संकीर्तन द्वारा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जागरण के प्रणेता चैतन्य महाप्रभु की जयंती के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, स्वामी शुकदेवानन्द ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भावपूर्ण श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये कहा कि भारत की संत परंपरा अद्भुत, जीवंत और प्रकाशमयी है, जिसने मानवता को प्रेम, सेवा, करुणा और भक्ति का सरल मार्ग दिखाया। हमारे पूज्य संतों ने त्याग और तप के साथ आनंदपूर्ण जीवन जीते हुए समाज को आध्यात्मिक दिशा दी। उनकी वाणी और साधना आज भी हमारे हृदय में शांति, विश्वास और ईश्वरानुभूति का दीप प्रज्वलित करती है।

श्री सुशील कुमार शिंदे जी, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री, भारत एवं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री दर्शनार्थ आये परमार्थ निकेतन। पूज्य स्वामीजी के पावन सान्निध्य में विश्व विख्यात गंगा जी की आरती में किया सहभाग। स्वामीजी ने कहा कि उनका सार्वजनिक जीवन समर्पण, सादगी और जनसेवा का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने प्रशासनिक कुशलता, संवेदनशील नेतृत्व और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा के साथ देश और राज्य की सेवा की।

मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने महाराष्ट्र के विकास, सामाजिक समरसता और आधारभूत संरचनाओं को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री के पद पर रहते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक शांति और सुशासन को प्राथमिकता दी।

श्री सुशील कुमार शिंदे जी, ने कहा कि परमार्थ निकेतन वास्तव में शान्ति प्रदान करने वाला ऐसा दिव्य आश्रम है जहां आते ही मन आनंदित हो जाता है। पूज्य स्वामीजी से विभिन्न समसामयिक विषयों पर चर्चा हुई। उनके विचारों की प्रखरता व चिंतन की तेजस्विता अद्भुत है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भक्ति ही जीवन का सर्वोच्च आनंद है। यही वह दिव्य शक्ति है जो मन को निर्मल, बुद्धि को प्रखर और आत्मा को चेतन बनाती है। भक्ति में डूबा हृदय भय, तनाव और अहंकार से मुक्त होकर प्रेम, शांति और प्रकाश का स्रोत बन जाता है। यही ईश्वर से मिलन का सबसे श्रेष्ठ मार्ग है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण था। दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में उनका हर क्षण माँ के चरणों में अर्पित था। उनकी भक्ति में बालक जैसी सरलता, माँ के प्रति अगाध विश्वास और पूर्ण समर्पण था। वे ईश्वर को देखने, उनसे बात करने और उन्हें जीने का अनुभव करते थे। उनके लिए भक्ति, साक्षात् अनुभूति थी। जब वे माँ काली के ध्यान में लीन होते, तो साधक और साध्य का भेद मिट जाता था। उनकी आँखों से बहते आँसू, उनके होंठों पर मुस्कान और उनकी आत्मविभोर अवस्था बताती थी कि सच्ची भक्ति ही परम आनंद का द्वार है।

दूसरी ओर चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति को केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जन-जन के हृदय तक पहुँचाया। उन्होंने हरिनाम संकीर्तन को सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति का माध्यम बनाया। सड़कों पर नाचते-गाते, ‘हरे कृष्ण’ का नाम गूंजाते हुए उन्होंने लोगों को बताया कि ईश्वर दूर नहीं, हमारे ही हृदय में वास करते हैं। उनका कीर्तन भी एक उत्सव था। उनके प्रेम और करुणा ने समाज में भेदभाव, अहंकार और निराशा को मिटाकर एक नई चेतना जगाई।

इन दोनों महान संतों का जीवन हमें संदेश देता है कि भक्ति मार्ग कठिन नहीं, बल्कि आनंदमय है। ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता त्याग और कठोरता से अधिक प्रेम और सरलता से प्रशस्त होता है। जब हम नाम जपते हैं, कीर्तन करते हैं, सेवा करते हैं, तो भीतर का तनाव, क्रोध और भय स्वतः समाप्त होने लगता है। भक्ति हमें बाहरी परिस्थितियों से ऊपर उठाकर आंतरिक शांति, संतोष और आनंद प्रदान करती है।

आज के तेज-रफ्तार, तनावपूर्ण और भौतिकवादी युग में यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक जीवन की दौड़ में मनुष्य सुख खोज रहा है, परंतु शांति उससे दूर होती जा रही है। ऐसे समय में संतों की वाणी हमें स्मरण कराती है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर से जुड़ने में है। भक्ति हमें स्वयं से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है और राष्ट्र की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है।

हमारी सनातन संस्कृति का मूल ही प्रेम, सेवा और साधना है। जब समाज भक्ति से जुड़ता है, तब करुणा बढ़ती है, परिवार मजबूत होते हैं और राष्ट्र में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि अब समय आ गया कि हम अपने घरों में भजन-कीर्तन की परंपरा पुनः जीवित करें। युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ें। भक्ति को अपने व्यवहार और कर्म में उतारें।

आइए, इन दिव्य संतों की प्रेरणा से संकल्प लें कि अपने जीवन को भक्ति के प्रकाश से आलोकित करेंगे और प्रेम, शांति तथा सद्भाव का संदेश समाज में प्रसारित करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma Working in journalism since 1985 as the first woman journalist of Uttarakhand. From 1989 for 36 years, she provided her strong services for India's top news agency PTI. Working for a long period of thirty-six years for PTI, he got her pen ironed on many important occasions, in which, by staying in Tehri for two months, positive reporting on Tehri Dam, which was in crisis of controversies, paved the way for construction with the power of her pen. Delivered.

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