परमार्थ निकेतन में दिव्यता व भव्यता के साथ मनाया गुरू पूजन-पादुका पूजन
भारत सहित विश्व के अनेक देशों से आये भक्तों ने परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन श्रीचरणों में संर्कीतन, भजनों व भावों से व्यक्त की भावनायें
परमार्थ गुरूकुल के नन्हे नन्हे ऋषिकुमारों ने गुरू शिष्य परम्परा की दिव्यता को किया आत्मसात
गुरु पूर्णिमा पर्व पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी का संदेश-परम्पराओं को बचाएँ, पर्यावरण को भी बचाएँ; संतति को बचाना है तो प्रकृति और संस्कृति दोनों को बचाएँ

ऋषिकेश, 29 जुलाई। गुरु पूर्णिमा पर्व के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सभी देशवासियों एवं विश्वभर में सनातन संस्कृति से जुड़े श्रद्धालुओं को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलकामनाएँ दीं।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल गुरु के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन पर्व है, यह जीवन को पूर्णता, समर्पण और सेवा से जोड़ने का दिव्य अवसर है। भारतीय गुरु-परम्परा हमें केवल ज्ञान के साथ प्रकृति, संस्कृति और समस्त सृष्टि के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है।

आज गुरु पूर्णिमा के पावन महोत्सव पर परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने आदि गुरु शंकराचार्य जी, महर्षि वेदव्यास जी से लेकर सम्पूर्ण गुरु-परम्परा, आचार्यों, परमाचार्यों एवं दैवी सम्पद् मण्डल की पूर्ण परम्परा को नमन करते हुए कहा कि आज का पर्व गुरु-पर्व है, गुरु पूर्णिमा है और पूर्ण होने का पर्व है। यह समर्पण का पर्व है, कृतज्ञता का पर्व है और कृत-कृत्य होने का पर्व है। हम कृतज्ञ भी हों और कृत-कृत्य भी हों। कृतज्ञता उस दिव्य परम्परा के प्रति, जिसकी वजह से आज हम हैं, और कृत-कृत्यता का अनुभव कि उन्हीं की कृपा से आज जीवन दिव्यता अनुभव करता है। जो भी हम अनुभव कर रहे हैं, वह सब उन महापुरुषों की कृपा है।
यह पर्व पवित्र होने का है, जीवन को धन्य बनाने का है। आज महर्षि वेदव्यास जी का प्राकट्य दिवस है। आज का दिन उस दिव्य लय और परम लय में विलय का दिन है।
पूज्यपाद महामण्डलेश्वर स्वामी शुकदेवानन्द जी महाराज कहा करते थे-जीवन मुक्ति सोइ, मुक्ति मरे न मुक्ति होय। उन्होंने यह मंत्र दिया और उसे अनुभव भी कराया। उसी का सार है-आज पहली बार मेरी ज़िन्दगी में कर रहा महसूस, मैं भी जी रहा हूँ। आज पहली बार मेरी ज़िन्दगी में बिन पिए भी पी रहा हूँ। आज पहली बार साँसों के सफ़र में हो सकी है एक अपनी चीज़ अपनी। आज पहली बार मेरी प्रातः हो सकी है मेरी अपनी। आज मैं अनमोल हूँ, बेमोल बिककर, जग न अब मेरी कहीं कीमत लगाए। इसलिए यदि द्वार आए मुक्ति भी, तो बेइजाज़त आज वह भी लौट जाए। यही अनुभव पूज्य महाराज श्री कराते थे।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि गुलाम व्यक्ति बनता है अपनी वासनाओं से। गुलाम व्यक्ति बनता है अपनी इच्छाओं से। जीवन में निराशा और उदासी सचमुच तभी आती है, जब व्यक्ति सही पथ पर गमन नहीं करता। मन में कुछ होगा और बाहर कुछ होगा, तो समस्याएँ तो आएँगी ही; लेकिन समस्याओं का समाधान उनके लिए होता है, जो, जो कुछ भी करते हैं, प्रभु का मानकर करते हैं।

आज से 56 वर्ष पूर्व एक बड़े प्यारे संत थे। जब परमार्थ निकेतन में प्रार्थना होती थी, तब वे गाते थे-मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया। जो भी अपने पास है, वह धन किसी का है दिया।
पूज्यपाद स्वामी भजनानन्द जी महाराज भी बड़ी गंभीरता से प्रतिदिन गाते थे-राम का नाम लेकर जो मर जाएँगे…वे इन पंक्तियों की चर्चा भी करते थे। उन सभी महापुरुषों ने अपने जीवन के सार को समझा था। जब हम अपने जीवन में यह अनुभव कर लेंगे, तब इन छोटी-छोटी बातों का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सच तो यह है कि यही छोटी-छोटी बातें हमें छोटा बना देती हैं। आज का दिन इन सभी छोटी बातों से ऊपर उठकर समर्पण का है।

यह दीनता और हीनता से ऊपर उठने का पर्व है, गुरु पूर्णिमा और जो दीनता व हीनता से उठाकर गले लगा ले, उसी का नाम सद्गुरु है। जब हम अपने स्वरूप को भूल जाते हैं, तब हर प्रकार की गुलामियाँ हमें घेर लेती हैं। उन सभी गुलामियों और तनावों से मुक्त होने का पर्व है गुरु पूर्णिमा।

गुरु पूर्णिमा का अर्थ ही है, जीवन में सबेरा होना, जीवन में प्रकाश का होना और जीवन में प्रकाश का प्रकट होना। जीवन में यह घट जाना ही गुरु पूर्णिमा है। प्रकाश ही जीवन है और अन्धेरा ही मृत्यु है। जन्म माँ देती है और जब जीवन मिलता है, तब गुरु पूर्णिमा होती है। यह किसी के हो जाने का पर्व है। यह समर्पण आ जाए, भटकाव मिट जाए, अन्धकार मिट जाए, कोहरा छँट जाए, इसी का नाम है गुरु पूर्णिमा।
खुद से खुद की मुलाकात करा देना ही गुरु पूर्णिमा है। गुरु पूर्णिमा सजावट का नहीं, स्वयं को सजाने का पर्व है। भारतीय चेतना कपड़ों का नहीं, कर्मों का पर्व है।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने वैश्विक परमार्थ परिवार को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से आशीर्वचन व आशीर्वाद प्रदान किया। पूरे विश्व से गुरु पूर्णिमा पर अनेकों श्रद्धालुओं व भक्तों ने अपने भावपूर्ण प्रणाम व वंदन भेजे। उसे स्वीकार करते हुए सभी के लिए माँ गंगा से मंगलकामनाएँ कीं और कहा कि जो जहाँ पर हैं, वहीं से अपने टाइम, टैलेंट, टेनासिटी व टेक्नोलॉजी से मानवता की सेवा करते रहें।
उन्होंने सभी का आह्वान करते हुये कहा कि परम्पराओं को बचाएँ, परन्तु पर्यावरण को भी बचाएँ। संतति को बचाना है तो प्रकृति और संस्कृति दोनों को बचाना होगा। यदि हमारी संस्कृति सुरक्षित रहेगी और प्रकृति संरक्षित रहेगी, तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
उन्होंने कहा, गुरु पूर्णिमा पर उस दिव्य सद्गुरु के नाम एक पेड़ अवश्य लगाएँ। यही गुरु-दक्षिणा का श्रेष्ठ स्वरूप है। एक वृक्ष पृथ्वी के प्रति हमारी श्रद्धा, आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी और गुरु के उपदेशों को जीवन में उतारने का सजीव प्रतीक है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि वृक्षारोपण केवल पर्यावरण संरक्षण का कार्य नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति, करुणा और भविष्य की रक्षा का संकल्प है। गुरु हमें जोड़ते हैं, जागृत करते हैं और जीवन को दिशा देते हैं। उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रत्येक व्यक्ति यदि एक वृक्ष लगाने और उसकी सेवा का संकल्प ले, तो यह गुरु पूर्णिमा वास्तव में धरती, मानवता और समस्त सृष्टि के लिए मंगलमयी बन सकती है।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma Working in journalism since 1985 as the first woman journalist of Uttarakhand. From 1989 for 36 years, she provided her strong services for India's top news agency PTI. Working for a long period of thirty-six years for PTI, he got her pen ironed on many important occasions, in which, by staying in Tehri for two months, positive reporting on Tehri Dam, which was in crisis of controversies, paved the way for construction with the power of her pen. Delivered.

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