
*सनातन ज्ञान की अमूल्य धरोहर से साक्षात्कार का ऐतिहासिक क्षण*

*पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भारत के 14वें पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ जी को भेंट किए “इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूइज्म’ के 11 खंड*
*भारत के 14वें पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ जी सपरिवार विश्व शान्ति हवन में किया सहभाग*
*“इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूइज्म’ भारत की आत्मा का दस्तावेज*
ऋषिकेश, 6 अक्टूबर 2026। भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा, संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म और सभ्यता के संरक्षण एवं वैश्विक प्रसार की दिशा में आज परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में एक अत्यंत गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण साकार हुआ। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं इंडिया हेरिटेज रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक-अध्यक्ष परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भारत के 14वें पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ जी को विश्व की अद्वितीय ज्ञान-धरोहर ‘ “इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूइज्म’ के 11 खंड भेंट किए।
यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान-परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के एक विराट संकल्प का साक्षात् हस्तांतरण है।
“इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूइज्म’ एक ऐसा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व ज्ञान-ग्रंथ है, जिसे पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी की दूरदर्शी प्रेरणा एवं संकल्प से निर्मित किया गया। इस महायज्ञ में विश्वभर के 1000 से अधिक विद्वानों ने योगदान दिया और लगभग 7000 प्रविष्टियों के माध्यम से भारतीय सभ्यता, दर्शन, अध्यात्म, इतिहास, विज्ञान, कला, स्थापत्य, संस्कृति, परंपराओं और जीवन दृष्टि के विविध आयामों को एक व्यापक विश्वकोशीय स्वरूप प्रदान किया गया।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने वर्ष 1987 में इतिहास में पहली बार हिंदू धर्म एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के एक प्रामाणिक विश्वकोश की आवश्यकता का संकल्प लिया था। वर्षों की साधना, शोध, संवाद और विश्वभर के विद्वानों के अथक योगदान एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भी इस विराट ज्ञान-यज्ञ में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हुए शोध, संपादन, समन्वय एवं संकलन में सक्रिय भूमिका निभाई जिसके पश्चात यह विराट संकल्प 11 खंडों के रूप में साकार हुआ।
लगभग दो दशकों से अधिक समय तक चले इस ज्ञान-यज्ञ का उद्देश्य केवल हिंदू धर्म को एक धार्मिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि भारत की संपूर्ण ज्ञान-संस्कृति और सभ्यता की व्यापकता को विश्व के समक्ष प्रमाणिक, अकादमिक और शोधपरक रूप में रखना था। इस विश्वकोश में भारतीय दर्शन, आध्यात्मिक परंपराओं, इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, कला एवं स्थापत्य सहित भारत की विविध स्वदेशी परंपराओं का भी विस्तृत समावेश है।

आज श्री जगदीप धनखड़ जी को 11 खंड भेंट किये, जो प्रतीक है कि भारत की आत्मा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है। हमारी सनातन परंपरा का ज्ञान किसी एक युग, भूभाग या पीढ़ी तक सीमित नहीं है; यह मानवता के लिए शाश्वत प्रकाश का स्रोत है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ज्ञान-परंपरा है और आज सबसे बड़ा संकट सोच का है। जब हम अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपने शास्त्रों, अपनी जीवन-दृष्टि और अपनी जड़ों को समझते हैं, तभी हम आत्मविश्वास के साथ भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। “इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूइज्म’ उसी आत्मबोध और आत्मगौरव की एक विराट यात्रा है।
उन्होंने कहा कि यह विश्वकोश “गागर में सागर” के समान है, हजारों वर्षों की भारतीय चेतना, चिंतन, साधना और संस्कृति को एक विशाल ज्ञान-संकलन में समेटने का अद्भुत प्रयास। यह भारत की सांस्कृतिक स्मृति और वैश्विक ज्ञान-संवाद का एक जीवंत सेतु है।
“इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दूइज्म’ की यात्रा अपने आप में अनेक ऐतिहासिक पड़ावों से जुड़ी रही है। इसका अंतरराष्ट्रीय संस्करण राष्ट्रपति भवन में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी को भेंट किया गया था। इसके पश्चात नई दिल्ली के विज्ञान भवन में इसका भव्य लोकार्पण हुआ तथा लंदन में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन जी ने भी इसके अंतरराष्ट्रीय संस्करण का शुभारंभ किया।
आज जब इसके सभी 11 खंड श्री जगदीप धनखड़ जी को भेंट किए गए, तो यह क्षण अतीत, वर्तमान और भविष्य के संगम जैसा बन गया, एक ओर भारत की हजारों वर्ष पुरानी सनातन ज्ञान-परंपरा, दूसरी ओर आधुनिक भारत का सार्वजनिक जीवन, और तीसरी ओर आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान एवं संस्कृति की अमूल्य विरासत।
आज का यह अवसर इस विराट संकल्प को पुनः स्मरण कराने वाला है कि भारत की संस्कृति जितनी प्राचीन है, उतनी ही जीवंत है; जितनी गहरी है, उतनी ही सार्वभौमिक है; और जितनी अपनी है, उतनी ही सम्पूर्ण मानवता के लिए उपयोगी है।
