कश्मीर शहीद दिवस पर परमार्थ निकेतन गंगा आरती की समर्पित
राष्ट्र है तो हम हैं, राष्ट्र की रक्षा ही सर्वाेच्च साधना है
देवभक्ति के साथ देशभक्ति ही हमारा परम धर्म
कश्मीर शहीद दिवस पर राष्ट्ररक्षा में बलिदान देने वाले अमर वीरों को भावभीनी श्रद्धांजलि
ऋषिकेश, 13 जुलाई 2026। कश्मीर शहीद दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वाेच्च बलिदान देने वाले सभी अमर वीरों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सीमाओं की रक्षा करने वाले वीर सैनिकों, सुरक्षा बलों तथा उन परिवारों के त्याग और समर्पण में निहित होती है, जो अपने प्रियजनों को मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं।
पूज्य स्वामी जी ने कहा, राष्ट्र है तो हम हैं। यदि राष्ट्र सुरक्षित है तो हमारी संस्कृति सुरक्षित है, हमारी आस्था सुरक्षित है, हमारा भविष्य सुरक्षित है इसलिए राष्ट्र की सेवा केवल सैनिकों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सेना केवल सीमाओं की प्रहरी नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की संरक्षक है। हमारे सैनिक कठिनतम परिस्थितियों, विषम मौसम और प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों में भी अदम्य साहस, अनुशासन और निःस्वार्थ सेवा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

पूज्य स्वामी जी ने कहा, हमारे वीर सैनिक वेतन के लिए नहीं, वतन के लिए जीते हैं। उनका प्रत्येक क्षण, प्रत्येक श्वास और प्रत्येक संकल्प भारत माता की सेवा को समर्पित होता है। जब पूरा देश चैन की नींद सोता है, तब हमारे सैनिक सीमाओं पर जागकर राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। उनके इस अमूल्य योगदान का ऋण कोई भी राष्ट्र कभी नहीं चुका सकता; हम केवल उनके प्रति कृतज्ञता, सम्मान और श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी के आदर्श को सर्वाेच्च स्थान देती आई है। मातृभूमि की सेवा केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना भी है। जब देवभक्ति और देशभक्ति एक साथ चलती हैं, तभी सच्चे अर्थों में राष्ट्र निर्माण संभव होता है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा, देवभक्ति हमें करुणा, सत्य और धर्म का मार्ग दिखाती है, जबकि देशभक्ति हमें उन मूल्यों की रक्षा के लिए प्रेरित करती है इसलिए प्रत्येक भारतीय को देवभक्ति के साथ देशशक्ति का भी संकल्प लेना चाहिए। यही हमारे ऋषियों की परम्परा और भारत की सनातन चेतना का संदेश है।

उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि राष्ट्रप्रेम केवल विशेष अवसरों तक सीमित न रहे, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन का संस्कार बने। अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना, पर्यावरण की रक्षा करना, समाज में सद्भाव बनाए रखना, संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना तथा सेवा और अनुशासन का जीवन अपनाना भी राष्ट्रसेवा के ही स्वरूप हैं।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता, आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक समृद्धि और राष्ट्रीय एकता में निहित है। जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र निर्माण का सहभागी मानता है, तो भारत निश्चित रूप से विश्व में शांति, सहअस्तित्व और मानवता का पथप्रदर्शक बन सकता है।
परमार्थ निकेतन गंगा आरती में देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सभी अमर वीरों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके परिवारों के प्रति गहरी संवेदनायें व्यक्त किया। मां गंगा से प्रार्थना है कि भारत सदैव सुरक्षित, समृद्ध, एकजुट और शांति, करुणा तथा आध्यात्मिक मूल्यों के प्रकाश से आलोकित रहे।