162वीं जयंती पर विशेष
बुद्धगया महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन के प्रणेता भिक्षु देवमित्र धम्मपाल जी के 162वें जन्मदिवस पर विश्व के समस्त बौद्ध समुदाय को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं
आज बुद्धगया महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन के प्रणेता कहे जाने वाले भिक्षु देवमित्र अनागारिक धम्मपाल जी का जन्मदिवस है। आज विश्व का बौद्ध समुदाय मन वचन से स्मरण करते हुए नमन कर रहा है।इनका जन्म 17 सितंबर 1864 को कोलंबो के एक बहुत अमीर ईसाई परिवार में हुआ था। इनका बचपन का नाम डेविड हेवावितरणे था। बड़े होकर डेविड “थियोसांफिकल सोसाइटी” के संस्थापक मैडम मैंरी एवं कर्नल हेनरी के संपर्क में आए जोकि बौद्ध धर्म के विद्वान थे। युवावस्था में ही डेविड बुद्ध की शिक्षाओं से काफी प्रभावित हुए और बुद्ध कालीन पालि भाषा सीखी और उसके बाद अपना नाम अनगरिक धम्मपाल रखा। अनागारिक अर्थात अब किसी समुदाय या नगर के नागरिक नहीं, बल्कि सामाजिक बंधनों से मुक्त व्यक्ति, सांसारिक आसक्ति नहीं। भारत में बुद्ध धर्म को फिर से जीवित करने वाले इस महामानव ने 13 जुलाई 1931 को बौद्ध भिक्षु के रूप में प्रवज्या ली और भिक्षु देवमित्र धम्मपाल कहलाए।
भिक्षु देवमित्र धम्मपाल जी ने सर एरनोल्ड की बुक “द लाइट ऑफ़ एशिया” पड़ी तो! मानो उन्हें बुद्ध भूमि भारत ने बुला लिया। वर्ष 1891 में बुद्ध भूमि बुद्धगया आए। यहां महाबोधि महाविहार की दुर्दशा, पुरोहितों का कब्जा, कर्मकांड देखकर काफी दुखी हुए। इसी तरह कुशीनगर एवं सारनाथ की दुर्दशा देखी। फिर तय किया कि भारत में रहकर प्रबुद्ध भारत का आगाज करेंगे, बुद्ध की वाणी का प्रचार -प्रसार करेंगे। 31 मई 1891 को महाबोधि सोसाइटी की स्थापना की, जिसका कार्यालय कोलंबो से कोलकाता बनाया। पूरी दुनिया को भारत के बौद्ध स्थलों की दुर्दशा से अवगत कराया। आखिर उन्ही के अथक प्रयासों से “महाबोधि महाविहार प्रबंधन समिति” बनी। जिसमें आज बौद्धों के चार प्रतिनिधि सम्मिलित होते हैं।

बुध्दगया के महाबोधि महाविहार (बुद्ध मंदिर) की मुक्ति का एक राष्ट्रव्यापी, विश्वव्यापी आंदोलन चलाया। उन्होंने एक बौद्ध सांस्कृतिक सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें भारत सहित जापान, श्रीलंका, चीन, बर्मा इत्यादि बौद्ध देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

सन् 1893 में शिकागो अमेरिका में हुए विश्व धर्म संसद में भिक्षु मित्रदेव धम्मपाल को आमंत्रित किया गया था। स्वामी विवेकानंद को अधिकृत निमंत्रण नहीं था। उन दिनों स्वामी विवेकानंद कोलकाता में भिक्षु मित्रदेव धम्मपाल जी के संपर्क में थे और मित्रता पूर्ण संबंध थे। इसलिए धम्मपाल जी ने आयोजको से निवेदन पर अपने संबोधन के समय से 3 मिनट का समय काटकर स्वामी विवेकानंद को बोलने के लिए दिया गया । स्वामी विवेकानंद ने हिंदू दर्शन पर अपना भाषण दिया।
विश्व धर्म संसद में भिक्षु मित्रदेव धम्मपाल जी द्वारा बौद्ध दर्शन पर दिए गए भाषण से विश्व धर्म संसद में आए दुनिया भर के विभिन्न धर्मो के विद्वान अचंभित रह गए और बुध्द की शिक्षाओं व भारत भूमि से प्रभावित हुए।
भारत में महाबोधि सोसाइटी की शाखाएँ स्थापित कीं। जिनमें कोलकाता, बुध्दगया, सारनाथ, संकिसा, श्रावस्ती, नई दिल्ली आदि प्रमुख शहरों पर बुद्ध बिहार एवं शाखाएं चल रही है।उनसे प्रभावित होकर होनोलूलू की एक श्रद्धालु महिला मेरी फोस्टर ने 1903 से 1913 तक, लगातार दस वर्षों तक, महाबोधि सोसाइटी को प्रतिमास 3000 रुपए की मासिक सहायता प्रदान की, जिससे उनके बौद्ध आंदोलन को बहुत बल मिला। अपने माता-पिता से मिली सारी संपत्ति को कोलंबो,कोलकाता,बुध्दगया,सारनाथ ,लंदन आदि स्थलों पर स्कूल ,कॉलेज ,पुस्तकालय ,ध्यान केंद्र आदि बनवाने में खर्च कर दी।
सन् 1904 से अनागारिक धर्मपाल ने सारनाथ को अपना स्थायी निवास बना लिया था। यहीं रहकर उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए प्रकाशन, व्याख्यान और यात्राएँ कीं। अमेरिका, यूरोप, जापान, बर्मा, फ्रांस, इटली, सिंगापुर, जावा, चीन, मंचूरिया, कोरिया, इंग्लैंड, स्विटजरलैंड, जर्मनी आदि देशों की यात्रा करके उन्होंने बुद्ध की वाणी को वैश्विक स्वर दिया। ‘महाबोधि मुद्रणालय’ नामक एक प्रकाशन संस्थान श्रीलंका में खोला।
बुद्ध के इस प्यारे सपूत ने अंततः अंतिम साँस भी अपनी ‘पुण्य-भूमि’ भारत के प्रमुख शहर वाराणसी में भगवान बुद्ध की धम्मोउपदेश स्थली सारनाथ में 29 अप्रैल, 1933 में ली। उनकी अस्थियाँ उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद में भगवान बुद्ध की प्रथम धामोंउपदेश स्थली सारनाथ की ‘मूलगंध कुटी’ में आज भी स्थापित हैं।


By Shashi Sharma

Shashi Sharma – Senior Woman Journalist

Shashi Sharma has been active in journalism since 1985, holding the distinction of being Uttarakhand's first female journalist.

For 36 years, starting in 1989, she rendered distinguished service to India's premier news agency, PTI. During this long tenure, she demonstrated the power of her writing on numerous significant occasions; notably, she spent two months in Tehri reporting positively on the Tehri Dam—which was then mired in controversy—and used her pen to help pave the way for its construction.

Currently, Mrs. Shashi Sharma runs the news portal *Newsok24.com* and serves as the editor of the weekly newspaper *Desh Nirdesh*; she is also a registered anchor and commentator for Delhi Doordarshan.

शशि शर्मा वरिष्ठ महिला पत्रकार शशि शर्मा उत्तराखंड की पहली महिला पत्रकार के तौर पर 1985 से पत्रकारिता में कार्यरत हैं। 1989 से 36 वर्षों तक उन्होंने भारत की शीर्ष समाचार एजेंसी पीटीआई के लिए अपनी सशक्त सेवाएं दीं। छत्तीस वर्षों की लंबी अवधि तक पीटीआई के लिए काम करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर अपनी कलम का लोहा मनवाया, जिसमें दो महीने तक टिहरी में रहकर विवादों के संकट में रहे टिहरी बांध पर सकारात्मक रिपोर्टिंग कर अपनी कलम की ताकत से निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में श्रीमती शशि शर्मा Newsok24 com न्यूज पोर्टल को चला रहीं हैं और साप्ताहिक समाचार पत्र देश निर्देश की सम्पादक होने के साथ ही दिल्ली दूरदर्शन की रजिस्टर्ड एंकर और कमेंटेटर भी हैं।

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