ऋषि पंचमी और इंजीनियर्स डे का संदेश – ज्ञान से सृजन और सृजन से राष्ट्र निर्माण की यात्रा
हमारे ऋषियों की ज्ञान-परंपरा और आधुनिक इंजीनियर्स की तकनीकी प्रतिभा मिलकर गढ़ सकती है आत्मनिर्भर भारत का उज्ज्वल भविष्य
ऋषि पंचमी एवं इंजीनियर्स डे के पावन संगम पर परमार्थ विद्या मन्दिर में सप्तऋषियों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सुंदरकांड का भावपूर्ण पाठ
ऋषिकेश। ऋषि पंचमी एवं इंजीनियर्स डे के पावन संगम पर परमार्थ विद्या मन्दिर में सप्तऋषियों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सुंदरकांड का भावपूर्ण पाठ किया। ऋषियों की तपस्या, ज्ञान और लोककल्याण की दिव्य परंपरा को स्मरण कर विद्यार्थियों ने ज्ञान को सेवा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का संकल्प लिया।
ऋषि पंचमी और इंजीनियर्स डे, दोनों ही अवसर हमें भारत की उस महान परंपरा का स्मरण कराते हैं, जिसकी मूल शक्ति ज्ञान, जिज्ञासा, अनुसंधान, सृजन और लोककल्याण रही है। ऋषियों ने अपनी तपस्या, साधना, चिंतन और खोज के माध्यम से मानवता को ज्ञान की अमूल्य विरासत दी, वहीं दूसरी ओर इंजीनियर्स डे हमें उन आधुनिक सृजनशील मस्तिष्कों को सम्मान देने का अवसर देता है, जो ज्ञान और तकनीक के माध्यम से राष्ट्र के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।
परमार्थ पीठाधीश्वर, परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा कि भारत की ऋषि-परंपरा केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण की प्रेरणा है। हमारे ऋषियों ने प्रकृति को केवल देखा नहीं, उसे समझा; जीवन को केवल जिया नहीं, उसके गहरे रहस्यों को खोजा। गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, योग, वास्तु, धातु विज्ञान, कृषि, जल प्रबंधन और दर्शन सहित ज्ञान के अनेक क्षेत्रों में भारत की प्राचीन उपलब्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वजों के लिए ज्ञान का उद्देश्य केवल जानना नहीं, बल्कि ज्ञान को जीवन और लोककल्याण से जोड़ना था।
उन्होंने कहा कि आज के इंजीनियर्स उसी खोजी चेतना के आधुनिक वाहक हैं। आज की प्रयोगशालाएँ और अनुसंधान केंद्र आधुनिक युग की तपोभूमियाँ हैं और इंजीनियर्स उस तपस्या के साधक हैं, जो नई तकनीक, नए समाधान और नई संभावनाओं का निर्माण कर रहे हैं।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि जिस देश के पास अपनी टेक्नोलॉजी होती है, उसके पास अपना भविष्य तय करने की ताकत भी होती है। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल वस्तुओं का उत्पादन करना नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार और तकनीक के क्षेत्र में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना है।
आज आवश्यकता है कि हमारे युवा केवल तकनीक के उपभोक्ता न बनें, बल्कि उसके सृजक और नेतृत्वकर्ता बनें। वे प्रश्न पूछें, प्रयोग करें, असफलताओं से सीखें और ऐसी तकनीक विकसित करें जो भारत की आवश्यकताओं के साथ-साथ सम्पूर्ण मानवता और प्रकृति के कल्याण की दिशा में कार्य करे।
आज भारत को ऐसे इंजीनियर्स की आवश्यकता है जिनके हाथों में तकनीक हो, हृदय में करुणा हो, विचारों में मौलिकता हो और दृष्टि में राष्ट्र एवं विश्व का कल्याण हो। हमें ऐसी टेक्नोलॉजी चाहिए जो जीवन को सरल बनाए, प्रकृति को सुरक्षित रखे, समाज के अंतिम व्यक्ति तक अवसर पहुँचाए और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर दुनिया का निर्माण करे।
ऋषियों से मिली ज्ञान-ज्योति, इंजीनियर्स की सृजन-शक्ति और युवाओं का आत्मविश्वास इन्हीं के संगम से विकसित, आत्मनिर्भर और विश्वकल्याणकारी भारत का निर्माण होगा।